…तो राष्ट्रपति नहीं, प्रधानमंत्री होते वेंकटरमन, राजीव गांधी की सरकार होती बर्खास्त!

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तारीख 13 जून 1987
बोफोर्स तोपों और पनडुब्बियों के घोटालों के प्रकाश में आने के बाद देश में सियासी भूचाल था. नई दिल्ली के पॉलिटिकल कॉरिडोर में हर तरफ आशंकाएं, राजनीतिक गुणा-गणित और अटकलों का बाजार गर्म था…काफी बहसें हो रही थीं. ऐसी अफवाहें उड़ने लगीं कि राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बर्खास्त करने वाले हैं. इसी माहौल के बीच कांग्रेस का एक वरिष्ठ सांसद जो बाद में विपक्ष का नेता बना. वह उपराष्ट्रपति वेंकटरमन से मिलता है. और बताता है कि वह कांग्रेस और गैर-कांग्रेस पार्टियों के 240 सांसदों की ओर से मिलने आया है. उसने वेंकटरमन से निवेदन किया कि वे प्रधानमंत्री बनने के लिए सहमत हो जाएं.

वेंकटरमन के सामने प्रस्ताव लाने वाले नेता ने कहा कि राष्ट्रपति ज्ञान जैल सिंह का भी इस सुझाव के प्रति रवैया अनुकूल है यानी वे भी इसके लिए तैयार हैं. वेंकटरमन इस प्रस्ताव को सुनकर अलर्ट हो गए. तैयारी कितनी थी इसे लेकर उनके मन में कई सवाल खड़े हो रहे थे. वे एक चतुर और अनुभवी राजनेता थे. प्रस्ताव को लेकर उन्होंने सतर्कता भरा रवैया अपनाया. वे जानते थे कि ज्ञानी जैल सिंह किसी भी सूरत में राष्ट्रपति की दूसरी पारी की तैयारी में हैं और उपराष्ट्रपति होने के नाते वे ही इस पंक्ति में अगले हैं और किसी भी ऐसी कोशिश का हिस्सा बनकर वे अपनी संभावनाओं को खत्म कर सकते हैं. 


उपराष्ट्रपति वेंकटरमन ने उस समय सीधे तौर पर मना नहीं किया और इस मामले पर वे लोगों से मिलते-जुलते रहे. राजीव गांधी की सत्तापलट का प्रस्ताव लाने वाले कांग्रेस के उस वरिष्ठ सांसद ने सुझाव रखा कि वेंकटरमन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से मिलें. ज्ञानी जैल सिंह अगले दिन खुद उपराष्ट्रपति से मिले. राष्ट्रपति ने वेंकटरमन से सीधा सवाल किया कि कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद के प्रस्ताव के संबंध में उनकी क्या प्रतिक्रिया हैं?

वेंकटरमन ने उन्हें स्पष्ट रूप से कहा कि वे षड्यंत्र में शामिल नहीं होंगे. वेंकटरमन को यह बात साफ दिखाई दे रही थी कि उन्हें राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस का उम्मीदवार चुन लिया जाएगा और कांग्रेस के भीतर विद्रोह की अभी बहुत कम संभावना है. वेंकटरमन ने बाद में इस पूरी साजिश की कहानी का खुलासा तो किया लेकिन कभी भी उस वरिष्ठ सांसद के नाम का खुलासा नहीं किया. सियासी गलियारे के बंद कमरों में चल रही इस सियासी पटकथा का पूरा खुलासा समाजवादी नेता मधु लिमये ने अपनी किताब ‘भारतीय राजनीति के विरोधाभास’ में विस्तार से किया है.

मधु लिमये इस पूरे किस्से पर आगे लिखते हैं- वामपंथी पार्टियां इस षड्यंत्र में शामिल नहीं थीं. और वैसे भी गैर-कांग्रेस और गैर वामपंथी दलों की लोकसभा में सदस्य-संख्या नगण्य थी. तो स्थितियां स्पष्ट होती जा रही थीं. वेंकटरमन समझ गए कि प्रधानमंत्री का पद दूर की चीज है, जबकि राष्ट्रपति का पद मुठ्ठी में दिख रहा था. अतः उन्होंने प्रस्ताव रखने वालों को दुत्कार दिया.


जहां तक ज्ञानी जैल सिंह की बात है तो, उनकी सबसे ज्यादा रुचि दूसरी बार राष्ट्रपति बनने में थी. उनके गंभीर प्रतिद्वंद्वी वेंकटरमन थे, कृष्णा अय्यर नहीं. वे दूसरी बार तभी राष्ट्रपति बन सकते थे जब कांग्रेस का विभाजन हो जाता और उनका एकमात्र प्रतिद्वंद्वी प्रधानमंत्री बन जाता. राष्ट्रपति का विचार था कि राजीव गांधी को बर्खास्त करके वेंकटरमन को प्रधानमंत्री बना देने से उनकी राष्ट्रपति पद के लिए दोबारा नामजदगी निश्चित है. लेकिन वेंकटरमन इस झांसे में फंसने से खुद को बचा ले गए.

मधु लिमये आगे लिखते हैं- ज्ञानी जैल सिंह उन दिनों अपने एक विश्वासपात्र के माध्यम से मुझसे संपर्क बनाए हुए थे. मैंने उन्हें लिखा कि उनका इरादा संदेह से ऊपर होना चाहिए. वे कहते थे कि मैं सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार खत्म करना चाहता हूं लेकिन जनता उनकी बात पर तभी विश्वास करेगी जब वे घोषणा करेंगे कि वे दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के इच्छुक नहीं हैं. यह घोषणा करने से उन्होंने इनकार कर दिया. प्रधानमंत्री की बर्खास्तगी के पीछे उनकी मुख्य चिंता दरअसल दोबारा राष्ट्रपति बनने की थी.


राष्ट्रपति के रूप में एक और पारी के लिए ज्ञानी जैल सिंह का ये प्लान वहीं का वहीं रह गया. बोफोर्स के मामले को लेकर अलग हुए वीपी सिंह और उनके साथी राजीव गांधी के लिए चुनौती बन गए. 1989 के चुनाव में वीपी सिंह की अगुवाई में जनता दल को 144 सीटें मिलीं. कांग्रेस को रोकने के लिए वामदल और भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया और नई सरकार बनी.


लेकिन तबतक हालात काफी बदल चुके थे, ज्ञानी जैल के बाद वेंकटरमन राष्ट्रपति बन चुके थे. उन्होंने वीपी सिंह को सरकार बनाने का मौका दिया और वीपी सिंह अगले 11 महीने तक प्रधानमंत्री रहे. लेकिन एक तरफ वामपंथी और दूसरी ओर बीजेपी के साथ कब तक सरकार चलाते तो कांग्रेस के एक दांव चलते ही वीपी सिंह की सरकार गिर गई और चंद्रशेखर के लिए सत्ता का रास्ता खुल गया. वेंकटरमन के साथ भी एक अनोखा रिकॉर्ड जुड़ गया. वे अकेले राष्ट्रपति हैं जिन्होंने चार प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया. जब उन्होंने राष्ट्रपति का पद संभाला तब राजीव गांधी की सरकार थी, उनके कार्यकाल में वीपी सिंह, चंद्रशेखर और पीवी नरसिम्हाराव ने भी शपथ ली. लेकिन ये तभी संभव हो पाया जब वे समय रहते ज्ञानी जैल सिंह की सियासी चाल में खुद को फंसने से बचाने में कामयाब रहे.

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फोटो क्रेडिटः गेटी इमेजेस, इंडिया टुडे आर्काइव

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