महाशिवरात्रिः परिवार को संभालना महादेव से सीखें, जानें-शिव परिवार की एक साथ पूजा का क्या है रहस्य

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भोर का समय था और नर्मदा का तट. मंद-मंद बह रही हवा के बीच नदी स्नान करने पहुंचे आचार्य गोविंद भगवदपाद् ने देखा कि  सात-आठ साल का एक बालक उधर ही बढ़ा चला आ रहा है. सिर पर शिखा, हाथ में ध्वजा, नंगे पांव और भगवा चीर ओढ़ रखे इस बालक में आकर्षण ही कुछ ऐसा था कि आचार्य एकटक उसे देखते रह गए. अब वह बालयोगी उनके पास ही खड़ा था. आचार्य और बालयोगी आमने-सामने थे और दोनों ही मौन. अगर नर्मदा की कलकल ने इस मौन को भंग न किया होता तो दोनों ही सिद्ध न जाने कितनी देर और इसी अवस्था में खड़े रहते. अपनी चुप्पी तोड़ते हुए आचार्य ने ही सवाल किया, तुम कौन हो?

ये तो वही सवाल था, जिसका जवाब जानने के लिए वह बालयोगी केरल के कालड़ी से चलकर और अपनी माता आर्यम्बा का आंचल छोड़कर इतनी दूर तक पैदल ही निकल आया था. बालयोगी ने जो जवाब दिया पहले वह जान लीजिए.

उसने कहा, ‘मैं न तो मन हूं, न बुद्धि, न अहंकार, न ही चित्त हूं. मैं न तो कान हूं, न जीभ, न नासिका, न ही नेत्र हूं. मैं न तो आकाश हूं, न धरती, न अग्नि, न ही वायु हूं. मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं. मैं निर्विकल्प हूं, निराकार हूं, मैं चैतन्यत के रूप में सब जगह व्याशप्ते हूं, सभी इन्द्रियों में हूं, न मुझे किसी चीज में आसक्ति है, न ही मैं उससे मुक्त हूं, मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं.’

मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे
न च व्योम भूमिर् न तेजो न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्
न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

क्या है शिवोऽहम् शिवॊऽहम्…

शिवोऽहम् शिवॊऽहम्… यानि कि मैं ही शिव हूं. बालयोगी से इस तरह का उत्तर सुनकर आचार्य भावविभोर हो गए और उसे अपने शिष्य के रूप में अपना लिया. आचार्य के शिष्य ने जल्द ही उनसे सभी ज्ञान सीख लिया और आगे चलकर आदि शंकराचार्य कहलाया. वही आदि शंकराचार्य, जिन्होंने भारत में फिर से वेद-वेदांग के साथ सनातन को स्थापित किया. आचार्य गोविंद भगवदपाद् ने बालयोगी को शिव अवतार के रूप में पहचाना, क्यों जो मन, बुद्धि, स्वाद, दृष्टि, लालसा और यहां तक की प्राण से भी परे होकर सिर्फ शुद्ध चेतना हो तो वह शिव के अतिरिक्त और कौन हो सकता है?


सभी प्राणियों की चेतना हैं शिव

सभी प्राणियों की चेतना शिव ही तो हैं. सनातन का जो अद्वैत ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ की बात करता है, उसका ही दूसरा रूप शिवोऽहम् है. ये दोनों ही कॉन्सेप्ट दो होते हुए भी एक ही हैं और यह कहते हैं कि संसार में जो कुछ भी दिख रहा है और जो नहीं भी दिख रहा है, वह ब्रह्म है, वही शिव है. ये व्याख्या हमें फिर से ऋग्वेद की ओर ले चलती है, जहां लिखा है एकम् सत विप्रः बहुधा वदंति. इसी सूक्त की व्याख्या छान्दोग्य उपनिषद कुछ इस तरह करते हैं, ‘एकोहं बहुस्याम:’. यानि कि मैं एक हूं और बहुत होना चाहता हूं.

ऋग्वेद में रुद्र कौन हैं?

इन सूक्तियों और संदर्भों के बीच अभी हम सिर्फ शिव को चुनते हैं और फिर से ऋग्वेद की ओर चलते हैं, जहां रुद्र का वर्णन है. ऋग्वैदिक युग में जहां एक ओर सूर्य, इंद्र, वरुण, मित्र और आदित्य देवों के लिए सूक्तियां लिखी गई हैं, वहीं ऋग्वेद में एक और सर्वशक्तिशाली देवता का जिक्र हुआ है, जिसे रुद्र कहा गया है. रुद्र इतना शक्तिशाली है कि उसे ही बलवानों में सबसे अधिक बलवान कहा गया है. यहां उसका स्वरूप एक ऐसे युवक के तौर पर है, जो शक्तिशाली है, सामर्थ्यवान है. उसमें अपार बल है.

बलवानों में सबसे बलवान और सबसे बड़े वैद्य भी हैं शिव

ऋग्वेद में रुद्र को पहले एक जगह शक्तिशाली और भयंकर कहा गया है. रुद्र का यही भयंकर रूप आगे की वैदिक रचनाओं और उनके बाद लिखे गए पुराणों में विनाश या प्रलय के देवता के रूप में बदल जाता है. जब पुराणों में त्रिदेवों का सिद्धांत सामने आया तब ब्रह्मा को सृष्टि का सृजनकर्ता, विष्णु को पालक और शिव को संहारक के रूप में पहचाना गया है. पुराणों में संहार के देवता ही वेदों में वर्णित रुद्र हैं ऐसा माना जाता है.

ऋग्वेद में रुद्र को मरुतों का पिता एवं स्वामी भी कहा गया है. रुद्र ने मरुतों को पृश्नि नाम की गायों के थनों से उत्पन्न किया था और वह स्वास्थ्य का देवता भी है.

मा त्वा रुद्र चक्रुधामा नमोभिर मा दुष्टुती वृषभ मा सहूती, उन्नो वीरां अर्पय भेषजेभिर् भिषकतमं त्वा भिषजां श्रणोमि.

वेद से पुराणों में रुद्र और शिव का वर्णन

रुद्र से शिव बनने के सफर में जब पुराणों की ओर बढ़ते हैं तो शिव का स्वरूप सिर्फ संहारक का नहीं रह जाता, बल्कि वह कृपालु, दयालु और जल्दी प्रसन्न हो जाने वाले देवता के रूप में सामने आते हैं. उनकी सबसे बड़ी खासियत है कि वह परिवार वाले हैं और परिवार की कल्पना के पहले उदाहरण हैं, जिसमें पति-पत्नी, बेटे-बेटियां, भाई-बहन का पूरा ब्योरा मिलता है. सनातनी कहानियों के जरिए जब एक आदर्श परिवार का उदाहरण दिया जाता है तो श्रीराम से भी पहले शिव परिवार का नाम लिया जाता है. कहते हैं कि सबसे अधिक तनाव वाला परिवार शिव परिवार ही है, जहां चाहें तो सभी एक-दूसरे के विरोधी हो सकते हैं. मसलन, शिव का वाहन नंदी एक बैल है, जबकि पार्वती का वाहन केहरि एक शेर है. शेर और बैल एक-दूसरे के विरोधी हैं. शिवजी के गले में पड़ा नाग, गणेश के वाहन चूहे का विरोधी है, तो वहीं कार्तिकेय का वाहन मोर, शिव के नाग का विरोधी है. आपस में इतना तनाव होने के बाद भी शिव परिवार में जो प्रेम है, वही प्रेम हमारे परिवारों में होना चाहिए. ऐसा कहा जाता है, इसीलिए शिव परिवार की एक साथ पूजा की जाती है.


शिव के हैं पांच मुख, कहलाते हैं पंचमुखी

पुराण कहानियों में भगवान विष्णु को पुराण पुरुष कहा गया है, तो वहीं रुद्र या शिव को तत्पुरुष कहा गया है. इसके अलावा वायु पुराण, शिव कथाओं को केंद्र में रखकर लिखे गए शिवपुराण में भी शिवजी को परब्रह्म कहा गया है और उनके पांच मुख बताए गए हैं. महादेव शिव के पांच मुख वाले स्वरूप को ‘पंचमुख’ या ‘पंचानन’ कहा जाता है. शिवजी के ये अलग-अलग मुख पांच तत्वों और पांच दिशाओं के प्रतीक हैं. इन्हें ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात कहा जाता है.

कौन हैं तत्तपुरुष

रुद्रगायत्री मंत्र में शिव को तत्पुरुष कहा गया है. तत्पुरुष का अर्थ है कारक पुरुष. यानी वह, जो प्रकृति के हर कर्म का निर्धारण करने वाला पहला तत्व है. यह वायु तत्व का अधिपति भी है. पौराणिक मान्यताओं के आधार पर यह महादेव का पूर्वदिशा में निर्धारित मुख है.

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात”

अघोर स्वरूप क्या है?

वहीं शिव का एक स्वरूप अघोर है. अघोर संसार की नश्वरता का प्रतीक है. जन्म के बाद मरण की अनिवार्यता और फिर जन्म के चक्र को समझाने वाला अघोर ही है. इसीलिए इसका स्वरूप भयानक है. यह शिवजी का विनाशक स्वरूप है. इसकी वंदना इस मंत्र से की गई है. यह मुख दक्षिण दिशा में है.
अघोरेभ्योSथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्य:, सर्वेभ्य सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेSस्तु रूद्ररुपेभ्य:

ईशान भी है शिवजी का नाम

शिवजी का एक नाम ईशान भी है. यह आकाश तत्व का अधिपति है और बताता है जिस तरह आकाश अनंत है, ठीक वैसी ही आत्मा भी है. उसका कोई अंत नहीं है और न ही कोई उसका अंत कर सकता है. आत्मा एक ऊर्जा है और वही ऊर्जा शिव है. ईशान का एक अर्थ स्वामी भी होता है. शिवजी की यह मुख आकाश की दिशा में ऊपर की ओर है.

ॐईशानः सर्वविध्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रम्हाधिपतिर्ब्रम्हणोधपतिर्ब्रम्हा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम..

पृथ्वी का प्रतीक है सद्योजात स्वरूप

शिव का एक स्वरूप सद्योजात भी है. यह पृथ्वी तत्व का प्रतीक है. पृथ्वी, जो सभी का पालन करती है और जो सभी जीवों का आधार है. यह परम स्वच्छ है, शुद्ध है और ज्ञान का सम्यक स्वरूप है.

“सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः. भवे भवे नाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः॥”

जल तत्व है वामदेव स्वरूप?

वामदेव भी शिवत्व का जल स्वरूप है. यह वरुण का अधिपति है और विकारों का नाश करता है. शिवजी का यह मुख उत्तर दिशा में है और काले रंग का है.

वामदेवायनमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय
नमो रुद्राय नमः कालाय नमः.

शिवजी के इसी स्वरूप को परब्रह्म की संज्ञा दी गई है. यह सदाशिव का प्रकट स्वरूप है, शिवजी को इस स्वरूप का एक अंश बताया जाता है.


शिव का नटराज स्वरूप

शिवपुराण में शिवजी के अवतारों की कथा का विस्तार से वर्णन किया गया है, लेकिन उनके दो स्वरूपों का जिक्र खासतौर पर मिलता है. एक है अर्धनारीश्वर और दूसरा है नटराज स्वरूप. ये दोनों ही रूप ऋग्वेद के भयानक रुद्र से चलकर पुराणों के दयालु शिव बनने के सफर के बीच की कड़ी हैं. तमिलनाडु के तंजावुर जिले के अरुलमिगु वेदपुरेश्वर मंदिर से 64 साल पहले एक प्रतिमा चोरी हुई थी. यह प्रतिमा न्यूयॉर्क के एक संग्रहालय में पाई गई थी. बीते साल इसकी भारत वापसी की चर्चा जोरों पर रही है. प्रतिमा नटराज शिव की है, जिसमें शिव त्रिभंगी मुद्रा में दिखते हैं. इस प्रतिमा की बनावट कुछ ऐसी है कि इसमें शिव का दाहिना पैर तो जमीन पर है, लेकिन बायां पैर, दाएं पैर को क्रॉस करते हुए हवा में हैं. दोनों हाथ इसी बाएं पैर से समांतर रेखा बनाते हुए हथेलियों के सिरों से जुड़े हैं. जिसमें बाएं हाथ की हथेली धरती को ओर है तो दाएं हाथ की हथेली आशीर्वाद की मुद्रा में सामने की ओर है. शिव के बाल खुले हुए हैं, चारों ओर अग्नि का गोल घेरा है और पैर के नीचे ध्यान से देखें तो एक राक्षस दबा हुआ है.

रुद्र और आनंद तांडव

शिव का यह स्वरूप नर्तक रूप है, जिसे नटराज कहते हैं और यह नृत्य रुद्र तांडव भी कहलाता है, वहीं जब शिव और पार्वती दोनों ही नृत्य में शामिल होते हैं तो इसे आनंद तांडव कहते हैं. जहां आनंद तांडव का अंतिम बिंदु है शिव और शक्ति का आपस में मिल जाना तो वहीं रुद्र तांडव प्रलंयकारी है. शिव इस नृत्य के बाद संहार करते हैं और पैर के नीचे दबा हुआ राक्षस उसी बुराई का प्रतीक है, जिनका शिव संहार करते हैं.

कौन है अपस्मार?

पैर के नीचे दबे हुए इस राक्षस का नाम अपस्मार है और इसका दमन शिव के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना है. हालांकि शिवजी की कथाओं में सबसे महान प्रसंग विषपान को कहा जाता है, लेकिन अपस्मार को मारना या उसे कंट्रोल में करना मानव जाति के लिए प्रेरणा है. अपस्मार पर नियंत्रण की ये घटना शिव पुराण के साथ-साथ स्कंद पुराण में भी दर्ज है. इसमें खास बात है आपको कहीं ये नहीं मिलेगा कि शिव ने अपस्मार का वध किया या उसकी हत्या की, बल्कि हर जगह अपस्मार पर नियंत्रण शब्द का प्रयोग ही मिलेगा. असल में अपस्मार का दूसरा अर्थ भ्रम है. यह अहंकार से जन्मा है और इसकी जद में आने के कारण चेतना नहीं रहती, बल्कि मनुष्य इसके नियंत्रण में हो जाता है.

मेडिकल साइंस में मिर्गी रोग को संस्कृत में अपस्मार ही कहा जाता है. स्कंद पुराण के मुताबिक एक बार ऋषियों को अहंकार के वश में होकर अपने त्याग और तप पर अहंकार हो गया. तभी भगवान शंकर और माता पार्वती भिक्षुक के वेश में वहां पहुंचे, सभी स्त्रियां उन्हें प्रणाम करने के लिए यज्ञ छोड़ कर उठ गयी. इससे उन ऋषियों को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने अपनी सिद्धि से कई विषधर सर्पों को महादेव पर आक्रमण करने को कहा किन्तु भगवान शंकर ने सभी सर्पों का दलन कर दिया. तब उन ऋषियों ने अपने अभिमान को एक इंसानी स्वरूप देकर शिवजी पर आक्रमण करने को कहा. अब अपस्मार बौने कद का एक राक्षस बन गया. असल में वह सभी प्राणियों के अभिमान-अहंकार का प्रकट स्वरूप था. अपस्मार ने अपनी शक्ति से माता पार्वती को भ्रमित कर दिया और उन्हें अचेत कर दिया.


शिवजी ने अपस्मार को क्यों नहीं मारा?

ये देख कर भगवान शंकर को गुस्सा आ गया और उन्होंने डमरू बजाकर युद्ध की घोषणा की. चूंकी अपस्मार बौना था, इसलिए उससे बराबरी का युद्ध संभव नहीं था, तब शिवजी ने अपना आकर बढ़ाकर अपस्मार को अपने पैरों के नीचे दबा लिया, और एक पैर पर खड़े होकर बार-बार उस पर कूदने लगे. नटराज रूप में भगवान शंकर ने एक पैर से उसे दबा कर और एक पैर उठाकर अपस्मार की सभी शक्तियों का दलन कर दिया और खुद को संतुलित करते हुए स्थिर हो गए. उनकी यही मुद्रा “अंजलि मुद्रा” कहलाई.

शिव ने अमर अपस्मार का वध नहीं किया, बल्कि उसे कंट्रोल किया. यह कथा हमें हमारे घमंड पर नियंत्रण की जरूरत बताती है. घमंड भी अज्ञानता से होता है और अज्ञानता ज्ञान से बहुत छोटी होती है. इसके बाद देवताओं ने इसी प्रकार अपस्मार को निष्क्रिय रखने की प्रार्थना की ताकि भविष्य में संसार में कोई उसकी शक्तियों के प्रभाव में न आये. नटराज रूप में महादेव ने जो 14 बार अपने डमरू का नाद किया था उसे ही आधार मान कर महर्षि पाणिनि ने 14 सूत्रों वाले रूद्राष्टाध्यायी “माहेश्वर सूत्र” की रचना की. यह माहेश्वर सूत्र संस्कृत व्याकरण और शब्द रचना के आधार हैं.

नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्।
उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धान् एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम् ॥

भाव- “नृत्य (ताण्डव) के अवसान (समाप्ति) पर नटराज (शिव) ने सनकादि ऋषियों की सिद्धि और कामना पूर्ति के लिये नवपंच (चौदह) बार डमरू बजाया. इस प्रकार चौदह शिवसूत्रों की ये जाल (वर्णमाला) प्रकट हुई.”

डमरु के चौदह बार बजाने से चौदह सूत्रों के रूप में ध्वनियां निकली, इन्हीं ध्वनियों से व्याकरण का प्रकाट्य हुआ. इसलिये व्याकरण सूत्रों के आदि-प्रवर्तक भगवान नटराज को माना जाता है. प्रसिद्ध है कि महर्षि पाणिनि ने इन सूत्रों को देवाधिदेव शिव के आशीर्वाद से प्राप्त किया जो कि पाणिनीय संस्कृत व्याकरण का आधार बना.

1. अइउण् 2. ऋऌक्, 3. एओङ्, 4. ऐऔच्, 5. हयवरट्, 6. लण्, 7. ञमङणनम्, 8. झभञ्, 9. घढधष्, 10. जबगडदश्, 11. खफछठथचटतव्, 12. कपय्, 13. शषसर्, 14. हल्

यही वजह है कि अगर विष्णुजी पुराण पुरुष हैं तो शिव कालपुरुष हैं. वह इसीलिए महाकाल कहलाते हैं. वह मृत्यु नहीं मोक्ष देते हैं और उनकी तीसरी आंख सिर्फ विनाश नहीं बल्कि जागृति का प्रतीक है. महामृत्युंजय मंत्र भी यही कहता है.

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

हम तीन नेत्रों वाले उसे तत्पुरुष की वास्तविकता का चिन्तन करते हैं जो जीवन की मधुर परिपूर्णता को पोषित करता है और वृद्धि करता है. हम जिन बंधनों में उलझे हुए हैं, ककड़ी की तरह हम इस बंधन वाले तने से अलग होकर मोक्ष धारण करें, इस बंधन में बार-बार बांधने वाली मृत्यु का भय छूटे, हम अमरत्व को समझें और इसके आनंद से वंचित न हों. शिव से उत्पन्न हम शिव में मिल जाएं, शिवोऽहम् शिवॊऽहम् . महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं.

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