रामचरित मानस खंड-16: जब भरतजी की बुद्धि फेरने के लिए देवताओं ने सरस्वतीजी से मांगी मदद

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(राम आ रहे हैं…जी हां, सदियों के लंबे इंतजार के बाद भव्य राम मंदिर बनकर तैयार है और प्रभु श्रीराम अपनी पूरी भव्यता-दिव्यता के साथ उसमें विराजमान हो रहे हैं. इस पावन अवसर पर aajtak.in अपने पाठकों के लिए लाया है तुलसीदास द्वारा अवधी में लिखी गई राम की कथा का हिंदी रूपांतरण (साभारः गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीरामचरितमानस).  इस श्रृंखला ‘रामचरित मानस’ में आप पढ़ेंगे भगवान राम के जन्म से लेकर लंका पर विजय तक की पूरी कहानी. आज पेश है इसका 16वां खंड…)


श्रीरामजी के आश्रम में भरतजी की सभा चल रही थी. दशरथजी की नगरी अयोध्या के रहने वाले और जो मिथिलापति जनकजी के नगर जनकपुर के रहने वाले ब्राह्मण थे, तथा सूर्यवंश के गुरु वसिष्ठजी तथा जनकजी के पुरोहित शतानन्दजी, जिन्होंने सांसारिक अभ्युदय का मार्ग तथा परमार्थ का मार्ग छान डाला था, वे सब धर्म, नीति, वैराग्य तथा विवेकयुक्त अनेकों उपदेश देने लगे. विश्वामित्रजी ने पुरानी कथाएं कह-कहकर सारी सभा को सुंदर वाणी से समझाया. तब श्रीरघुनाथजी ने विश्वामित्रजी से कहा कि हे नाथ! कल सब लोग बिना जल पिए ही रह गए थे, अब कुछ आहार करना चाहिए. विश्वामित्रजी ने कहा कि श्रीरघुनाथजी उचित ही कह रहे हैं. ढाई पहर दिन बीत गया. विश्वामित्रजी का रुख देखकर तिरहुत राज जनकजी ने कहा- यहां अन्न खाना उचित नहीं है. राजा का सुंदर कथन सबके मन को अच्छा लगा. सब आज्ञा पाकर नहाने चले. उसी समय अनेकों प्रकार के बहुत से फल, फूल, पत्ते, मूल आदि बहंगियों और बोझों में भर-भरकर वनवासी लोग ले आए. श्रीरामचंद्रजी की कृपा से सब पर्वत मनचाही वस्तु देने वाले हो गए. वे देखने मात्र से ही दुखों को सर्वथा हर लेते थे. वहां के तालाबों, नदियों, वन और पृथ्वी के सभी भागों में मानो आनंद और प्रेम उमड़ रहा है. बेलें और वृक्ष सभी फल और फूलों से युक्त हो गए. पक्षी, पशु और भौंरे अनुकूल बोलने लगे. उस अवसर पर वन में बहुत उत्साह था, सब किसी को सुख देने वाली शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा चल रही थी.

वन की मनोहरता वर्णन नहीं की जा सकती, मानो पृथ्वी जनकजी की पहुनाई कर रही है. तब जनकपुरवासी सब लोग नहा-नहाकर श्रीरामचंद्रजी, जनकजी और मुनि की आज्ञा पाकर, सुंदर वृक्षों को देख-देखकर प्रेम में भरकर जहां-तहां उतरने लगे. पवित्र, सुंदर और अमृत के समान स्वादिष्ट अनेकों प्रकार के पत्ते, फल, मूल और कन्द श्रीरामजी के गुरु वसिष्ठजी ने सबके पास बोझे भर-भरकर आदरपूर्वक भेजे. तब वे पितर- देवता, अतिथि और गुरु की पूजा करके फलाहार करने लगे. इस प्रकार चार दिन बीत गए. श्रीरामचंद्रजी को देखकर सभी नर-नारी सुखी हैं. दोनों समाजों के मन में ऐसी इच्छा है कि श्रीसीतारामजी के बिना लौटना अच्छा नहीं है. श्रीसीतारामजी के साथ वन में रहना करोड़ों देवलोकों के समान सुखदायक है. श्रीलक्ष्मणजी, श्रीरामजी और श्रीजानकीजी को छोड़कर जिसको घर अच्छा लगे, विधाता उसके विपरीत हैं. जब देव सबके अनुकूल हो, तभी श्रीरामजी के पास वन में निवास हो सकता है. श्रीरामजी के पर्वत, वन और तपस्वियों के स्थानों में घूमना और अमृत के समान कन्द, मूल, फलों का भोजन, चौदह वर्ष सुख के साथ पल के समान हो जाएंगे. सब लोग कह रहे हैं कि हम इस सुख के योग्य नहीं हैं, हमारे ऐसे भाग्य कहां? दोनों समाजों का श्रीरामचंद्रजी के चरणों में सहज स्वभाव से ही प्रेम है.

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इस प्रकार सब मनोरथ कर रहे हैं. उनके प्रेमयुक्त वचन सुनते ही सुनने वालों के मनों को हर लेते हैं. उसी समय सीताजी की माता श्रीसुनयनाजी की भेजी हुई दासियां सुंदर अवसर देखकर आईं. उनसे यह सुनकर कि सीता की सब सासें इस समय फुरसत में हैं, जनकराज का रनिवास उनसे मिलने आया. कौशल्याजी ने आदरपूर्वक उनका सम्मान किया और समयोचित आसन लाकर दिए. दोनों ओर सबके शील और प्रेम को देखकर और सुनकर कठोर वज्र भी पिघल जाते हैं. शरीर पुलकित और शिथिल हैं और नेत्रों में शोक और प्रेम के आंसू हैं. सब अपने पैरों के नखों से जमीन कुरेदने और सोचने लगीं- सभी श्रीसीतारामजी के प्रेम की मूर्ति सी हैं, मानो स्वयं करुणा ही बहुत-से वेष धारण करके विसूर रही हो (दुख कर रही हो). सीताजी की माता सुनयनाजी ने कहा- विधाता की बुद्धि बड़ी टेढ़ी है, जो दूध के फेन-जैसी कोमल वस्तु को वज्र की टांकी से फोड़ रहा है. अमृत केवल सुनने में आता है और विष जहां-तहां प्रत्यक्ष देखे जाते हैं. विधाता की सभी करतूतें भयंकर हैं. जहां-तहां कौए, उल्लू और बगुले ही दिखाई देते हैं; हंस तो एक मानसरोवर में ही है. यह सुनकर देवी सुमित्राजी शोक के साथ कहने लगीं- विधाता की चाल बड़ी ही विपरीत और विचित्र है, जो सृष्टि को उत्पन्न करके पालता है और फिर नष्ट कर डालता है. विधाता की बुद्धि बालकों के खेल के समान भोली है.


कौशल्याजी ने कहा- किसी का दोष नहीं है; दुख-सुख, हानि-लाभ सब कर्म के अधीन हैं. कर्म की गति कठिन है, उसे विधाता ही जानता है, जो शुभ और अशुभ सभी फलों का देने वाला है. ईश्वर की आज्ञा सभी के सिर पर है. उत्पत्ति, स्थिति और लय (संहार) तथा अमृत और विष के भी सिर पर है. हे देवी! मोहवश सोच करना व्यर्थ है. विधाता का प्रपंच ऐसा ही अचल और अनादि है. महाराज के मरने और जीने की बात को हृदय में याद करके जो चिन्ता करती हैं, वह तो हे सखी! हम अपने ही हित की हानि देखकर (स्वार्थवश) करती हैं. सीताजी की माता ने कहा- आपका कथन उत्तम और सत्य है. आप पुण्यात्माओं के सीमारूप अवधपति (महाराज दशरथजी) की ही तो रानी हैं. 

कौशल्याजी ने दुख भरे हृदय से कहा- श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वन में जाएं, इसका परिणाम तो अच्छा ही होगा, बुरा नहीं. मुझे तो भरत की चिन्ता है. ईश्वर के अनुग्रह और आपके आशीर्वाद से मेरे चारों पुत्र और चारों बहुएं गंगाजी के जल के समान पवित्र हैं. हे सखी! मैंने कभी श्रीराम की सौगन्ध नहीं की, सो आज श्रीराम की शपथ करके सत्य भाव से कहती हूं- भरत के शील, गुण, नम्रता, बड़प्पन, भाईपन, भक्ति, भरोसे और अच्छेपन का वर्णन करने में सरस्वतीजी की बुद्धि भी हिचकती है. सीप से कहीं समुद्र उलीचे जा सकते हैं? मैं भरत को सदा कुल का दीपक जानती हूं. महाराज ने भी बार-बार मुझे यही कहा था. सोना कसौटी पर कसे जाने पर और रत्न पारखी के मिलने पर ही पहचाना जाता है. वैसे ही पुरुष की परीक्षा समय पड़ने पर उसके स्वभाव से ही हो जाती है.

 

 

किन्तु आज मेरा ऐसा कहना भी अनुचित है. शोक और स्नेह में विवेक कम हो जाता है. कौशल्याजी की गंगाजी के समान पवित्र करने वाली वाणी सुनकर सब रानियां स्नेह के मारे विकल हो उठीं. कौशल्याजी ने फिर धीरज धरकर कहा- हे देवी मिथिलेश्वरी! सुनिए, ज्ञान के भंडार श्रीजनकजी की प्रिया आपको कौन उपदेश दे सकता है? हे रानी! मौका पाकर आप राजा को अपनी ओर से जहां तक हो सके समझाकर कहिएगा कि लक्ष्मण को घर रख लिया जाए और भरत वन को जाएं. यदि यह राय राजा के मन में ठीक जंच जाए, तो भलीभांति खूब विचारकर ऐसा यत्न करें. मुझे भरत का अत्यधिक सोच है. भरत के मन में गूढ़ प्रेम है. उनके घर रहने में मुझे भलाई नहीं जान पड़ती. कौशल्याजी का स्वभाव देखकर और उनकी सरल और उत्तम वाणी को सुनकर सब रानियां करुणरस में निमग्न हो गईं. आकाश से पुष्पवर्षा की झड़ी लग गई और धन्य धन्य की ध्वनि होने लगी. सिद्ध, योगी और मुनि स्नेह से शिथिल हो गए. सारा रनिवास देखकर थकित रह गया (निस्तब्ध हो गया), तब सुमित्राजी ने धीरज धरके कहा कि हे देवी! दो घड़ी रात बीत गई है.

यह सुनकर श्रीरामजी की माता कौशल्याजी प्रेमपूर्वक उठीं और प्रेमसहित सद्भाव से बोलीं- अब आप शीघ्र डेरे को पधारिए. हमारे तो अब ईश्वर ही गति हैं, अथवा मिथिलेश्वर जनक जी सहायक हैं. कौशल्याजी के प्रेम को देखकर और उनके विनम्र वचनों को सुनकर जनकजी की प्रिय पत्नी ने उनके पवित्र चरण पकड़ लिए और कहा- हे देवी! आप राजा दशरथजी की रानी और श्रीरामजी की माता हैं. आपकी ऐसी नम्रता उचित ही है. प्रभु अपने नीच जनों का भी आदर करते हैं. अग्नि धुएं को और पर्वत तृण (घास) को अपने सिर पर धारण करते हैं. हमारे राजा तो कर्म, मन और वाणी से आपके सेवक हैं और सदा सहायक तो श्रीमहादेव-पार्वतीजी हैं. आपका सहायक होने योग्य जगत में कौन है? दीपक सूर्य की सहायता करने जाकर कहीं शोभा पा सकता है? श्रीरामचंद्रजी वन में जाकर देवताओं का कार्य करके अवधपुरी में अचल राज्य करेंगे. देवता, नाग और मनुष्य सब श्रीरामचंद्रजी की भुजाओं के बल पर अपने-अपने स्थानों में सुखपूर्वक बसेंगे. यह सब याज्ञवल्क्य मुनि ने पहले ही से कह रखा है. हे देवी! मुनि का कथन व्यर्थ नहीं हो सकता. ऐसा कहकर बड़े प्रेम से पैरों पड़कर सीताजी को साथ भेजने के लिए विनती करके और सुंदर आज्ञा पाकर तब सीताजी समेत सीताजी की माता डेरे को चलीं. जानकीजी अपने प्यारे कुटुम्बियों से जो जिस योग्य था, उससे उसी प्रकार मिलीं. जानकीजी को तपस्विनी के वेष में देखकर सभी शोक से अत्यंत व्याकुल हो गए. जनकजी श्रीरामजी के गुरु वसिष्ठजी की आज्ञा पाकर डेरे को चले और आकर उन्होंने सीताजीको देखा. जनकजी ने अपने पवित्र प्रेम और प्राणों की पाहुनी जानकीजी को हृदय से लगा लिया.


उनके हृदय में वात्सल्य प्रेम का समुद्र उमड़ पड़ा. राजा का मन मानो प्रयाग हो गया. उस समुद्र के अंदर उन्होंने सीताजी के अलौकिक स्नेहरूपी अक्षयवट को बढ़ते हुए देखा. उस सीताजी के प्रेमरूपी वट पर श्रीरामजी का प्रेमरूपी बालक सुशोभित हो रहा है. जनकजी का ज्ञानरूपी चिरंजीवी (मार्कण्डेय) मुनि व्याकुल होकर डूबते-डूबते मानो उस श्रीरामप्रेमरूपी बालक का सहारा पाकर बच गया. वस्तुत ज्ञानिशिरोमणि विदेहराज की बुद्धि मोह में मग्न नहीं है. यह तो श्रीसीतारामजी के प्रेम की महिमा है जिसने उन-जैसे महान ज्ञानी के ज्ञान को भी विकल कर दिया. पिता-माता के प्रेम के मारे सीताजी ऐसी विकल हो गईं कि अपने को संभाल न सकीं. पृथ्वी की कन्या सीताजी ने समय और सुंदर धर्म का विचार कर धैर्य धारण किया.

सीताजी को तपस्विनी-वेष में देखकर जनकजी को विशेष प्रेम और सन्तोष हुआ. उन्होंने कहा- बेटी! तूने दोनों कुल पवित्र कर दिए. तेरे निर्मल यश से सारा जगत उज्ज्वल हो रहा है; ऐसा सब कोई कहते हैं. तेरी कीर्तिरूपी नदी देवनदी गंगाजी को भी जीतकर जो एक ही ब्रह्माण्ड में बहती है करोड़ों ब्रह्माण्डों में बह चली है. गंगाजी ने तो पृथ्वी पर तीन ही स्थानों (हरिद्वार, प्रयागराज और गंगासागर) को बड़ा तीर्थ बनाया है. पर तेरी इस कीर्तिनदी ने तो अनेकों संतसमाजरूपी तीर्थस्थान बना दिए हैं. पिता जनकजी ने तो स्नेह से सच्ची सुंदर वाणी कही. परंतु अपनी बड़ाई सुनकर सीताजी मानो संकोच में समा गईं. पिता-माता ने उन्हें फिर हृदय से लगा लिया और हितभरी सुंदर सीख और आशीष दी.

सीताजी कुछ कहती नहीं हैं, परंतु मन में सकुचा रही हैं कि रात में सासों की सेवा छोड़कर यहां रहना अच्छा नहीं है. रानी सुनयनाजी ने जानकीजी का रुख देखकर राजा जनकजी को जना दिया. तब दोनों अपने हृदयों में सीताजी के शील और स्वभाव की सराहना करने लगे. राजा-रानी ने बार-बार मिलकर और हृदय से लगाकर तथा सम्मान करके सीताजी को विदा किया. चतुर रानी ने समय पाकर राजा से सुंदर वाणी में भरतजी की दशा का वर्णन किया. सोने में सुगंध और समुद्र से निकली हुई सुधा में चंद्रमा के सार अमृत के समान भरतजी का व्यवहार सुनकर राजा ने प्रेमविह्वल होकर अपने प्रेमाश्रुओं के जल से भरे नेत्रों को मूंद लिया. वे बोले- हे सुमुखि! हे सुनयनी! सावधान होकर सुनो. भरतजी की कथा संसार के बन्धन से छुड़ाने वाली है. धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार – इन तीनों विषयों में अपनी बुद्धि के अनुसार मेरी थोड़ी-बहुत गति है (अर्थात इनके सम्बन्ध में मैं कुछ जानता हूं). वह (धर्म, राजनीति और ब्रह्मज्ञान में प्रवेश रखने वाली) मेरी बुद्धि भरतजी की महिमा का वर्णन तो क्या करे, छल करके भी उसकी छाया तक को नहीं छू पाती! ब्रह्माजी, गणेशजी, शेषजी, महादेवजी, सरस्वतीजी, कवि, ज्ञानी, पंडित और बुद्धिमान सब किसी को भरतजी के चरित्र, कीर्ति, करनी, धर्म, शील, गुण और निर्मल ऐश्वर्य समझने में और सुनने में सुख देने वाले हैं और पवित्रता में गंगाजी का तथा स्वाद में अमृत का भी तिरस्कार करने वाले हैं.


भरतजी असीम गुणसम्पन्न और उपमारहित पुरुष हैं. भरतजी के समान बस, भरतजी ही हैं, ऐसा जानो. सुमेरु पर्वत को क्या सेर के बराबर कह सकते हैं? इसलिए (उन्हें किसी पुरुष के साथ उपमा देने में) कविसमाज की बुद्धि भी सकुचा गई! हे श्रेष्ठ वर्णवाली! भरतजी की महिमा का वर्णन करना सभी के लिए वैसे ही अगम है जैसे जलरहित पृथ्वी पर मछली का चलना. हे रानी! सुनो, भरतजी की अपरिमित महिमा को एक श्रीरामचंद्रजी ही जानते हैं; किन्तु वे भी उसका वर्णन नहीं कर सकते. इस प्रकार प्रेमपूर्वक भरतजी के प्रभाव का वर्णन करके, फिर पत्नी के मन की रुचि जानकर राजा ने कहा- लक्ष्मणजी लौट जाएं और भरतजी वन को जाएं, इसमें सभी का भला है और यही सबके मन में है. परंतु हे देवी! भरतजी और श्रीरामचंद्रजी का प्रेम और एक-दूसरे पर विश्वास, बुद्धि और विचार की सीमा में नहीं आ सकता. यद्यपि श्रीरामचंद्रजी समता की सीमा हैं, तथापि भरतजी प्रेम और ममता की सीमा हैं. श्रीरामचंद्रजी के प्रति अनन्य प्रेम को छोड़कर भरतजी ने समस्त परमार्थ, स्वार्थ और सुखों की ओर स्वप्न में भी मन से भी नहीं ताका है. श्रीरामजी के चरणों का प्रेम ही उनका साधन है और वही सिद्धि है. मुझे तो भरतजी का बस, यही एकमात्र सिद्धान्त जान पड़ता है.

राजा ने बिलखकर प्रेम से गद्गद होकर कहा- भरतजी भूलकर भी श्रीरामचंद्रजी की आज्ञा को मन से भी नहीं टालेंगे. इसलिए स्नेह के वश होकर चिन्ता नहीं करनी चाहिए. श्रीरामजी और भरतजी के गुणों की प्रेमपूर्वक गणना करते (कहते-सुनते) पति-पत्नी को रात पलक के समान बीत गई. प्रातःकाल दोनों राजसमाज जागे और नहा-नहाकर देवताओं की पूजा करने लगे.

श्रीरघुनाथजी स्नान करके गुरु वसिष्ठजी के पास गए और चरणों की वन्दना करके उनका रुख पाकर बोले- हे नाथ! भरत, अवधपुरवासी तथा माताएं, सब शोक से व्याकुल और वनवास से दुखी हैं. मिथिलापति राजा जनकजी को भी समाजसहित क्लेश सहते बहुत दिन हो गए. इसलिए हे नाथ! जो उचित हो वही कीजिए. आप ही के हाथ सभी का हित है. ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी अत्यंत ही सकुचा गए. उनका शील-स्वभाव देखकर मुनि वसिष्ठजी पुलकित हो गए. उन्होंने खुलकर कहा- हे राम! तुम्हारे बिना घर-बार आदि सम्पूर्ण सुखों के साज दोनों राजसमाजों को नरक के समान हैं. हे राम! तुम प्राणों के भी प्राण, आत्मा के भी आत्मा और सुख के भी सुख हो. हे तात! तुम्हें छोड़कर जिन्हें घर सुहाता है, उन्हें विधाता विपरीत है. जहां श्रीराम के चरणकमलों में प्रेम नहीं है, वह सुख, कर्म और धर्म जल जाए. जिसमें श्रीरामप्रेम की प्रधानता नहीं है, वह योग कुयोग है और वह ज्ञान अज्ञान है. तुम्हारे बिना ही सब दुखी हैं और जो सुखी हैं वे तुम्हीं से सुखी हैं. जिस किसी के जी में जो कुछ है तुम सब जानते हो. आपकी आज्ञा सभी के सिरपर है. कृपालु को सभी की स्थिति अच्छी तरह मालूम है. अतः आप आश्रम को पधारिए. इतना कह मुनिराज स्नेह से शिथिल हो गए.तब श्रीरामजी प्रणाम करके चले गए और ऋषि वसिष्ठजी धीरज धरकर जनकजी के पास आए.

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गुरुजी ने श्रीरामचंद्रजी के शील और स्नेह से युक्त स्वभाव से ही सुंदर वचन राजा जनकजी को सुनाए और कहा- हे महाराज! अब वही कीजिए जिसमें सबका धर्मसहित हित हो. हे राजन! तुम ज्ञान के भंडार, सुजान, पवित्र और धर्म में धीर हो. इस समय तुम्हारे बिना इस दुविधा को दूर करने में और कौन समर्थ है? मुनि वसिष्ठजी के वचन सुनकर जनकजी प्रेम में मग्न हो गए. उनकी दशा देखकर ज्ञान और वैराग्य को भी वैराग्य हो गया. वे प्रेम से शिथिल हो गए और मन में विचार करने लगे कि हम यहां आए, यह अच्छा नहीं किया. राजा दशरथजी ने श्रीरामजी को वन जाने के लिए कहा और स्वयं अपने प्रिय के प्रेम को प्रमाणित कर दिया. प्रियवियोग में प्राण त्याग दिए. परंतु हम अब इन्हें वन से और गहन वन को भेजकर अपने विवेक की बड़ाई में आनन्दित होते हुए लौटेंगे कि हमें जरा भी मोह नहीं है; हम श्रीरामजी को वन में छोड़कर चले आए, दशरथजी की तरह मरे नहीं! तपस्वी, मुनि और ब्राह्मण यह सब सुन और देखकर प्रेमवश बहुत ही व्याकुल हो गए. समय का विचार करके राजा जनकजी धीरज धरकर समाजसहित भरतजी के पास चले. भरतजी ने आकर उन्हें आगे होकर लिया और समयानुकूल अच्छे आसन दिए. तिरहुतराज जनकजी कहने लगे- हे तात भरत! तुमको श्रीरामजी का स्वभाव मालूम ही है.


श्रीरामचंद्रजी सत्यव्रती और धर्मपरायण हैं, सबका शील और स्नेह रखने वाले हैं. इसीलिए वे संकोचवश संकट सह रहे हैं; अब तुम जो आज्ञा दो, वह उनसे कही जाए. भरतजी यह सुनकर पुलकितशरीर हो नेत्रों में जल भरकर बड़ा भारी धीरज धरकर बोले- हे प्रभो! आप हमारे पिता के समान प्रिय और पूज्य हैं. और कुलगुरु श्रीवसिष्ठजी के समान हितैषी तो माता-पिता भी नहीं हैं. विश्वामित्रजी आदि मुनियों और मन्त्रियों का समाज है. और आज के दिन ज्ञान के समुद्र आप भी उपस्थित हैं. हे स्वामी! मुझे अपना बच्चा, सेवक और आज्ञानुसार चलने वाला समझकर शिक्षा दीजिए. इस समाज और पुण्य स्थल में आप जैसे ज्ञानी और पूज्य का पूछना! इसपर यदि मैं मौन रहता हूं तो मलिन समझा जाऊंगा; और बोलना पागलपन होगा तथापि मैं छोटे मुंह बड़ी बात कहता हूं. हे तात! विधाता को प्रतिकूल जानकर क्षमा कीजिएगा. वेद, शास्त्र और पुराणों में प्रसिद्ध है और जगत जानता है कि सेवाधर्म बड़ा कठिन है. स्वामी धर्म में और स्वार्थ में विरोध है. वैर अंधा होता है और प्रेम को ज्ञान नहीं रहता. अतएव मुझे पराधीन जानकर (मुझसे न पूछकर) श्रीरामचंद्रजी के रुख (रुचि), धर्म और सत्य के व्रत को रखते हुए, जो सबके सम्मत और सबके लिए हितकारी हो आप सबका प्रेम पहचानकर वही कीजिए. भरतजी के वचन सुनकर और उनका स्वभाव देखकर समाजसहित राजा जनक उनकी सराहना करने लगे. भरतजी के वचन सुगम और अगम, सुंदर, कोमल और कठोर हैं. उनमें अक्षर थोड़े हैं, परंतु अर्थ अत्यंत अपार भरा हुआ है.

जैसे मुख का प्रतिबिम्ब दर्पण में दिखता है और दर्पण अपने हाथ में है, फिर भी वह मुख का प्रतिबिम्ब पकड़ा नहीं जाता, इसी प्रकार भरतजी की यह अद्भुत वाणी भी पकड़ में नहीं आती. किसी से कुछ उत्तर देते नहीं बना तब राजा जनकजी, भरतजी तथा मुनि वसिष्ठजी समाज के साथ वहां गए जहां देवतारूपी कुमुदों के खिलाने वाले (सुख देने वाले) चंद्रमा श्रीरामचंद्रजी थे. यह समाचार सुनकर सब लोग सोच से व्याकुल हो गए; जैसे नए (पहली वर्षा के) जल के संयोग से मछलियां व्याकुल होती हैं. देवताओं ने पहले कुलगुरु वसिष्ठजी की दशा देखी, फिर विदेहजी के विशेष स्नेह को देखा; और तब श्रीरामभक्ति से ओतप्रोत भरतजी को देखा. इन सबको देखकर स्वार्थी देवता घबड़ाकर हृदय में हार मान गए.उन्होंने सब किसी को श्रीरामप्रेम में सराबोर देखा. इससे देवता इतने सोचके वश हो गए कि जिसका कोई हिसाब नहीं. देवराज इन्द्र सोच में भरकर कहने लगे कि श्रीरामचंद्रजी तो स्नेह और संकोच के वश में हैं. इसलिए सब लोग मिलकर कुछ माया रचो; नहीं तो काम बिगड़ा ही समझो. देवताओं ने सरस्वती का स्मरण कर उनकी सराहना (स्तुति) की और कहा- हे देवी! देवता आपके शरणागत हैं, उनकी रक्षा कीजिए.अपनी माया रचकर भरतजी की बुद्धि को फेर दीजिए और छल की छाया कर देवताओं के कुल की रक्षा कीजिए.देवताओं की विनती सुनकर और देवताओं को स्वार्थ के वश होने से मूर्ख जानकर बुद्धिमती सरस्वतीजी बोलीं- मुझसे कह रहे हो कि भरतजी की मति पलट दो! हजार नेत्रों से भी तुमको सुमेरु नहीं सूझ पड़ता!

 

 

ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माया बड़ी प्रबल है! किन्तु वह भी भरतजी की बुद्धि की ओर ताक नहीं सकती. उस बुद्धि को, तुम मुझसे कह रहे हो कि भोली कर दो (भुलावे में डाल दो)! अरे! चांदनी कहीं प्रचंड किरण वाले सूर्य को चुरा सकती है? भरतजी के हृदय में श्रीसीतारामजी का निवास है. जहां सूर्य का प्रकाश है, वहां कहीं अंधेरा रह सकता है? ऐसा कहकर सरस्वतीजी ब्रह्मलोक को चली गईं. देवता ऐसे व्याकुल हुए जैसे रात्रि में चकवा व्याकुल होता है. मलिन मनवाले स्वार्थी देवताओं ने बुरी सलाह करके बुरा ठाट (षड्यन्त्र) रचा. प्रबल मायाजाल रचकर भय, भ्रम, अप्रीति और उच्चाटन फैला दिया. कुचाल करके देवराज इन्द्र सोचने लगे कि काम का बनना-बिगड़ना सब भरतजी के हाथ है. इधर राजा जनकजी मुनि वसिष्ठ आदि के साथ श्रीरघुनाथजी के पास गए. सूर्यकुल के दीपक श्रीरामचंद्रजी ने सबका सम्मान किया, तब रघुकुल के पुरोहित वसिष्ठजी समय, समाज और धर्म के अविरोधी वचन बोले. उन्होंने पहले जनकजी और भरतजी का संवाद सुनाया. फिर भरतजीकी कही हुई सुंदर बातें कह सुनाईं. फिर बोले- हे तात राम! मेरा मत तो यह है कि तुम जैसी आज्ञा दो, वैसी ही सब करें! यह सुनकर दोनों हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजी सत्य, सरल और कोमल वाणी बोले- आपके और मिथिलेश्वर जनकजी के विद्यमान रहते मेरा कुछ कहना सब प्रकार से अनुचित है. आपकी और महाराज की जो आज्ञा होगी, मैं आपकी शपथ करके कहता हूं. वह सत्य ही सबको शिरोधार्य होगी.


श्रीरामचंद्रजी की शपथ सुनकर सभा समेत मुनि और जनकजी सकुचा गए. किसी से उत्तर देते नहीं बनता, सब लोग भरतजी का मुंह ताक रहे हैं. भरतजी ने सभा को संकोच के वश देखा. भरतजी ने बड़ा भारी धीरज धरकर और कुसमय देखकर अपने उमड़ते हुए प्रेम को संभाला, जैसे बढ़ते हुए विन्ध्याचल को अगस्त्यजी ने रोका था. शोकरूपी हिरण्याक्ष ने सारी सभा की बुद्धिरूपी पृथ्वी को हर लिया जो विमल गुणसमूहरूपी जगत की योनि (उत्पन्न करने वाली) थी. भरतजी के विवेक रूपी विशाल वराह (वराहरूपधारी भगवान) ने शोकरूपी हिरण्याक्ष को नष्ट कर बिना ही परिश्रम उसका उद्धार कर दिया! भरतजी ने प्रणाम करके सबके प्रति हाथ जोड़े तथा श्रीरामचंद्रजी, राजा जनकजी, गुरु वसिष्ठजी और साधु-संत सबसे विनती की और कहा- आज मेरे इस अत्यंत अनुचित बर्ताव को क्षमा कीजिएगा. मैं कोमल (छोटे) मुख से कठोर (धृष्टतापूर्ण) वचन कह रहा हूं. फिर उन्होंने हृदय में सुहावनी सरस्वतीजी का स्मरण किया. वे मानस से उनके मुखारविन्द पर आ विराजीं. निर्मल विवेक, धर्म और नीति से युक्त भरतजी की वाणी सुंदर हंसिनी के समान गुण-दोष का विवेचन करने वाली है. विवेक के नेत्रों से सारे समाज को प्रेम से शिथिल देख, सबको प्रणामकर, श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजी का स्मरण करके भरतजी बोले- हे प्रभु! आप पिता, माता, सुहृद् ( मित्र), गुरु, स्वामी, पूज्य, परम हितैषी और अन्तर्यामी हैं. सरलहृदय, श्रेष्ठ मालिक, शील के भण्डार, शरणागत की रक्षा करने वाले, सर्वज्ञ, सुजान, समर्थ, शरणागत का हित करने वाले, गुणों का आदर करने वाले और अवगुणों तथा पापों को हरने वाले हैं.

हे गोसाईं! आप-सरीखे स्वामी आप ही हैं और स्वामी के साथ द्रोह करने में मेरे समान मैं ही हूं. मैं मोहवश प्रभु (आप) के और पिताजी के वचनों का उल्लंघन और समाज बटोरकर यहां आया हूं. जगत में भले-बुरे, ऊंचे और नीचे, अमृत और अमरपद (देवताओं का पद), विष और मृत्यु आदि किसी को भी कहीं ऐसा नहीं देखा-सुना जो मन में भी श्रीरामचंद्रजी की आज्ञा को मेट दे. मैंने सब प्रकार से वही ढिठाई की, परंतु प्रभु ने उस ढिठाई को स्नेह और सेवा मान लिया! हे नाथ! आपने अपनी कृपा और भलाई से मेरा भला किया, जिससे मेरा दूषण (दोष) भी भूषण (गुण) के समान हो गए और चारों ओर मेरा सुंदर यश छा गया. हे नाथ! आपकी रीति और सुंदर स्वभाव की बड़ाई जगत में प्रसिद्ध है, और वेद-शास्त्रों ने गाई है. जो क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कुबुद्धि, कलंकी, नीच, शीलरहित, निरीश्वरवादी (नास्तिक) और निडर हैं. उन्हें भी आपने शरण में सम्मुख आया सुनकर एक बार प्रणाम करने पर ही अपना लिया. उन शरणागतों के दोषों को देखकर भी आप कभी हृदय में नहीं लाए और उनके गुणों को सुनकर साधुओं के समाज में उनका बखान किया.

ऐसा सेवक पर कृपा करने वाला स्वामी कौन है जो आप ही सेवक का सारा साज-सामान सज दे और स्वप्न में भी अपनी कोई करनी न समझकर उलटा सेवक को संकोच होगा, इसका सोच अपने हृदय में रखे! मैं भुजा उठाकर और प्रण रोपकर बड़े जोर के साथ कहता हूं, ऐसा स्वामी आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है. बंदर आदि पशु नाचते और तोते सीखे हुए पाठ में प्रवीण हो जाते हैं. परंतु तोते का पाठप्रवीणता रूप गुण और पशु के नाचने की गति क्रमशः पढ़ाने वाले और नचाने वाले के अधीन है. इस प्रकार अपने सेवकों की बिगड़ी बात सुधारकर और सम्मान देकर आपने उन्हें साधुओं का शिरोमणि बना दिया. कृपालु के सिवा अपनी विरदावली का और कौन जबर्दस्ती पालन करेगा? मैं शोक से या स्नेह से या बालकस्वभाव से आज्ञा को बायें लाकर (न मानकर) चला आया, तो भी कृपालु स्वामी (आप) ने अपनी ओर देखकर सभी प्रकार से मेरा भला ही माना. मैंने सुंदर मंगलों के मूल आपके चरणों का दर्शन किया, और यह जान लिया कि स्वामी मुझ पर स्वभाव से ही अनुकूल हैं. इस बड़े समाज में अपने भाग्य को देखा कि इतनी बड़ी चूक होने पर भी स्वामी का मुझपर कितना अनुराग है!


हे नाथ! मैंने स्वामी और समाज के संकोच को छोड़कर अविनय या विनयभरी जैसी रुचि हुई वैसी ही वाणी कहकर सर्वथा ढिठाई की है. हे देव! मेरे आर्तभाव (आतुरता) को जानकर आप क्षमा करेंगे. सुहृद (बिना ही हेतु के हित करने वाले), बुद्धिमान् और श्रेष्ठ मालिक से बहुत कहना बड़ा अपराध है. इसलिए हे देव! अब मुझे आज्ञा दीजिए, आपने मेरी सभी बात सुधार दी. प्रभु (आप) के चरणकमलों की रज, जो सत्य, सुकृत (पुण्य) और सुख की सुहावनी सीमा (अवधि) है, उसकी दुहाई करके मैं अपने हृदय की जागते, सोते और स्वप्न में भी बनी रहने वाली रुचि (इच्छा) कहता हूं. वह रुचि है- कपट, स्वार्थ और (अर्थ-धर्म-काम-मोक्षरूप) चारों फलों को छोड़कर स्वाभाविक प्रेम से स्वामी की सेवा करना. और आज्ञापालन के समान श्रेष्ठ स्वामी की और कोई सेवा नहीं है. हे देव! अब वही आज्ञारूप प्रसाद सेवक को मिल जाए. भरतजी ऐसा कहकर प्रेम के बहुत ही विवश हो गए. शरीर पुलकित हो उठा, नेत्रों में प्रेमाश्रुओं का जल भर आया. अकुलाकर (व्याकुल होकर) उन्होंने प्रभु श्रीरामचंद्रजी के चरणकमल पकड़ लिए. उस समय को और स्नेह को कहा नहीं जा सकता. कृपासिन्धु श्रीरामचंद्रजी ने सुंदर वाणी से भरतजी का सम्मान करके हाथ पकड़कर उनको अपने पास बिठा लिया. भरतजी की विनती सुनकर और उनका स्वभाव देखकर सारी सभा और श्रीरघुनाथजी स्नेह से शिथिल हो गए. श्रीरघुनाथजी, साधुओं का समाज, मुनि वसिष्ठजी और मिथिलापति जनकजी स्नेह से शिथिल हो गए. सब मन-ही-मन भरतजी के भाईपन और उनकी भक्ति की अतिशय महिमा को सराहने लगे. देवता मलिन मन से भरतजी की प्रशंसा करते हुए उनपर फूल बरसाने लगे.

दोनों समाजों के सभी नर-नारियों को दीन और दुखी देखकर महामलिन-मन इन्द्र मरे हुओं को मारकर अपना मंगल चाहता है. देवराज इन्द्र कपट और कुचाल की सीमा है. उसे पराई हानि और अपना लाभ ही प्रिय है. इन्द्र की रीति कौए के समान है. वह छली और मलिन-मन है, उसका कहीं किसी पर विश्वास नहीं है. पहले तो कुमत (बुरा विचार) करके कपट को बटोरा फिर वह (कपटजनित) उचाट सबके सिर पर डाल दिया. फिर देवमाया से सब लोगों को विशेषरूप से मोहित कर दिया. किन्तु श्रीरामचंद्रजी के प्रेम से उनका अत्यंत बिछोह नहीं हुआ. भय और उचाट के वश किसी का मन स्थिर नहीं है. क्षण में उनकी वन में रहने की इच्छा होती है और क्षण में उन्हें घर अच्छे लगने लगते हैं. मन की इस प्रकार की दुविधामई स्थिति से प्रजा दुखी हो रही है. मानो नदी और समुद्र के संगम का जल क्षुब्ध हो रहा हो. चित्त दोतरफा हो जाने से वे कहीं सन्तोष नहीं पाते और एक-दूसरे से अपना मर्म भी नहीं कहते. कृपानिधान श्रीरामचंद्रजी यह दशा देखकर हृदय में हंसकर कहने लगे- कुत्ता, इन्द्र और नवयुवक (कामी पुरुष) एक सरीखे हैं.

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भरतजी, जनकजी, मुनिजन, मन्त्री और ज्ञानी साधु-संतों को छोड़कर अन्य सभी पर जिस मनुष्य को जिस योग्य पाया, उसपर वैसे ही देवमाया लग गई. कृपासिन्धु श्रीरामचंद्रजी ने लोगों को अपने स्नेह और देवराज इन्द्र के भारी छल से दुखी देखा. सभा, राजा जनक, गुरु, ब्राह्मण और मन्त्री आदि सभी की बुद्धि को भरतजी की भक्ति ने कील दिया. सब लोग चित्रलिखे-से श्रीरामचंद्रजी की ओर देख रहे हैं. सकुचाते हुए सिखाए हुए से वचन बोलते हैं. भरतजी की प्रीति, नम्रता, विनय और बड़ाई सुनने में सुख देनेवाली है, पर उसके वर्णन करने में कठिनता है. जिनकी भक्ति का लवलेश देखकर मुनिगण और मिथिलेश्वर जनकजी प्रेम में मग्न हो गए, उन भरतजी की महिमा तुलसीदास कैसे कहे? परंतु वह बुद्धि अपने को छोटी और भरतजी की महिमा को बड़ी जानकर कविपरम्परा की मर्यादा को मानकर सकुचा गई. उसकी गुणों में रुचि तो बहुत है; पर उन्हें कह नहीं सकती. बुद्धि की गति बालक के वचनों की तरह हो गई. भरतजी का निर्मल यश निर्मल चंद्रमा है और कवि की सुबुद्धि चकोरी है, जो भक्तों के हृदयरूपी निर्मल आकाश में उस चंद्रमा को उदित देखकर उसकी ओर टकटकी लगाए देखती ही रह गई है तब उसका वर्णन कौन करे? भरतजी के स्वभाव का वर्णन वेदों के लिए भी सुगम नहीं है. अतः मेरी तुच्छ बुद्धि की चंचलता को कविलोग क्षमा करें! भरतजी के सद्भाव को कहते-सुनते कौन मनुष्य श्रीसीतारामजी के चरणों में अनुरक्त न हो जाएगा.

भरतजीका स्मरण करने से जिसको श्रीरामजी का प्रेम सुलभ न हुआ, उसके समान वाम (अभागा) और कौन होगा? दयालु और सुजान श्रीरामजी ने सभी की दशा देखकर और भक्त (भरतजी) के हृदय की स्थिति जानकर, धर्मधुरन्धर, धीर, नीति में चतुर; सत्य, स्नेह, शील और सुख के समुद्र; नीति और प्रीति के पालन करने वाले श्रीरघुनाथजी देश, काल, अवसर और समाज को देखकर, तदनुसार ऐसे वचन बोले जो मानो वाणी के सर्वस्व ही थे, परिणाम में हितकारी थे और सुनने में चंद्रमा के रस (अमृत)-सरीखे थे. उन्होंने कहा- हे तात भरत! तुम धर्म की धुरी को धारण करने वाले हो, लोक और वेद दोनों के जानने वाले और प्रेम में प्रवीण हो. हे तात! कर्म से, वचन से और मन से निर्मल तुम्हारे समान तुम्हीं हो. गुरुजनों के समाज में और ऐसे कुसमय में छोटे भाई के गुण किस तरह कहे जा सकते हैं? हे तात! तुम सूर्यकुल की रीति को, सत्यप्रतिज्ञ पिताजी की कीर्ति और प्रीति को, समय, समाज और गुरुजनों की लज्जा को तथा उदासीन, मित्र और शत्रु सबके मन की बात को जानते हो. तुमको सबके कर्मों का और अपने तथा मेरे परम हितकारी धर्म का पता है. यद्यपि मुझे तुम्हारा सब प्रकार से भरोसा है, तथापि मैं समय के अनुसार कुछ कहता हूं- हे तात! पिताजी के बिना हमारी बात केवल गुरुवंश की कृपा ने ही संभाल रखी है; नहीं तो हमारे समेत प्रजा, कुटुम्ब, परिवार सभी बर्बाद हो जाते.


यदि बिना समय के (संध्या से पूर्व ही) सूर्य अस्त हो जाए तो कहो जगत में किसको क्लेश न होगा? हे तात! उसी प्रकार का उत्पात विधाता ने यह (पिता की असामयिक मृत्यु) किया है. पर मुनि महाराज ने तथा मिथिलेश्वर ने सबको बचा लिया. राज्य का सब कार्य, लज्जा, प्रतिष्ठा, धर्म, पृथ्वी, धन, घर इन सभी का पालन (रक्षण) गुरुजी का प्रभाव (सामर्थ्य) करेगा और परिणाम शुभ होगा. गुरुजी का प्रसाद ही घर में और वन में समाजसहित तुम्हारा और हमारा रक्षक है. माता, पिता, गुरु और स्वामी की आज्ञा का पालन समस्त धर्मरूपी पृथ्वी को धारण करने में शेषजी के समान है. हे तात! तुम वही करो और मुझसे भी कराओ तथा सूर्यकुल के रक्षक बनो. साधक के लिए यह एक ही आज्ञापालन रूपी साधना सम्पूर्ण सिद्धियों की देने वाली, कीर्तिमयी, सद्गतिमयी और ऐश्वर्यमयी त्रिवेणी है. इसे विचारकर भारी संकट सहकर भी प्रजा और परिवार को सुखी करो. हे भाई! मेरी विपत्ति सभी ने बांट ली है, परंतु तुमको तो अवधि (चौदह वर्ष) तक बड़ी कठिनाई है. तुमको कोमल जानकर भी मैं कठोर (वियोग की बात) कह रहा हूं. हे तात! बुरे समय में मेरे लिए यह कोई अनुचित बात नहीं है. कुअवसर में श्रेष्ठ भाई ही सहायक होते हैं. वज्र के आघात भी हाथ से ही रोके जाते हैं. सेवक हाथ, पैर और नेत्रों के समान और स्वामी मुख के समान होना चाहिए.

श्रीरघुनाथजी की वाणी सुनकर, जो मानो प्रेमरूपी समुद्र के मन्थन से निकले हुए अमृत में सनी हुई थी, सारा समाज शिथिल हो गया; सबको प्रेमसमाधि लग गई. यह दशा देखकर सरस्वती ने चुप साध ली. भरतजी को परम सन्तोष हुआ. स्वामी के सम्मुख (अनुकूल) होते ही उनके दुख और दोषों ने मुंह मोड़ लिया. उनका मुख प्रसन्न हो गया और मन का विषाद मिट गया. मानो गूंगे पर सरस्वती की कृपा हो गई हो. उन्होंने फिर प्रेमपूर्वक प्रणाम किया और करकमलों को जोड़कर वे बोले- हे नाथ! मुझे आपके साथ जाने का सुख प्राप्त हो गया और मैंने जगत में जन्म लेने का लाभ भी पा लिया. हे कृपालु! अब जैसी आज्ञा हो, उसी को मैं सिरपर धरकर आदरपूर्वक करूं! परंतु देव! आप मुझे वह अवलम्बन (कोई सहारा) दें जिसकी सेवा कर मैं अवधि का पार पा जाऊं. हे देव! स्वामी (आप) के अभिषेक के लिए गुरुजी की आज्ञा पाकर मैं सब तीर्थों का जल लेता आया हूं; उसके लिए क्या आज्ञा होती है? मेरे मन में एक और बड़ा मनोरथ है, जो भय और संकोच के कारण कहा नहीं जाता. श्रीरामचंद्रजी ने कहा हे भाई! कहो. तब प्रभु की आज्ञा पाकर भरतजी स्नेहपूर्ण सुंदर वाणी बोले- आज्ञा हो तो चित्रकूट के पवित्र स्थान, तीर्थ, वन, पक्षी-पशु, तालाब-नदी, झरने और पर्वतों के समूह तथा विशेषकर प्रभु (आप) के चरणचिह्नों से अंकित भूमि को देख आऊं.

 

 

श्रीरघुनाथजी बोले- अवश्य ही अत्रि ऋषि की आज्ञा को सिरपर धारण करो (उनसे पूछकर वे जैसा कहें वैसा करो) और निर्भय होकर वन में विचरो. हे भाई! अत्रि मुनि के प्रसाद से वन मंगलों को देने वाला, परम पवित्र और अत्यंत सुंदर है और ऋषियों के प्रमुख अत्रिजी जहां आज्ञा दें, वहीं लाया हुआ तीर्थों का जल स्थापित कर देना. प्रभु के वचन सुनकर भरतजी ने सुख पाया और आनन्दित होकर मुनि अत्रिजी के चरणकमलों में सिर नवाया. समस्त सुंदर मंगलों का मूल भरतजी और श्रीरामचंद्रजी का संवाद सुनकर स्वार्थी देवता रघुकुल की सराहना करके कल्पवृक्ष के फूल बरसाने लगे. ‘भरतजी धन्य हैं, स्वामी श्रीरामजी की जय हो!’ ऐसा कहते हुए देवता बलपूर्वक (अत्यधिक) हर्षित होने लगे. भरतजीके वचन सुनकर मुनि वसिष्ठजी, मिथिलापति जनकजी और सभा में सब किसी को बड़ा उत्साह (आनंद) हुआ. भरतजी और श्रीरामचंद्रजी के गुणसमूह की तथा प्रेम की विदेहराज जनकजी पुलकित होकर प्रशंसा कर रहे हैं. सेवक और स्वामी दोनों का सुंदर स्वभाव है. इनके नियम और प्रेम पवित्र को भी अत्यंत पवित्र करनेवाले हैं. मन्त्री और सभासद सभी प्रेममुग्ध होकर अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार सराहना करने लगे. श्रीरामचंद्रजी और भरतजी का संवाद सुन-सुनकर दोनों समाजों के हृदयों में हर्ष और विषाद दोनों हुए.

श्रीरामचंद्रजी की माता कौशल्याजी ने दुख और सुख को समान जानकर श्रीरामजी के गुण कहकर दूसरी रानियों को धैर्य बंधाया. कोई श्रीरामजी की बड़ाई (बड़प्पन) की चर्चा कर रहे हैं, तो कोई भरतजी के अच्छेपन की सराहना करते हैं. तब अत्रिजी ने भरतजी से कहा- इस पर्वत के समीप ही एक सुंदर कुआं है. इस पवित्र, अनुपम और अमृत-जैसे तीर्थजल को उसी में स्थापित कर दीजिए. भरतजी ने अत्रिमुनि की आज्ञा पाकर जल के सब पात्र रवाना कर दिए और छोटे भाई शत्रुघ्न, अत्रि मुनि तथा अन्य साधु-सन्तों सहित आप वहां गए जहां वह अथाह कुआं था. और उस पवित्र जल को उस पुण्यस्थल में रख दिया. तब अत्रि ऋषि ने प्रेम से आनन्दित होकर ऐसा कहा- हे तात! यह अनादि सिद्धस्थल है. कालक्रम से यह लोप हो गया था इसलिए किसी को इसका पता नहीं था, तब भरतजी के सेवकों ने उस जलयुक्त स्थान को देखा और उस सुंदर तीर्थों के जल के लिए एक खास कुआं बना लिया. देवयोग से विश्वभर का उपकार हो गया. धर्म का विचार जो अत्यंत अगम था, वह इस कूप के प्रभाव से सुगम हो गया. अब इसको लोग भरतकूप कहेंगे. तीर्थों के जल के संयोग से तो यह अत्यंत ही पवित्र हो गया. इसमें प्रेमपूर्वक नियम से स्नान करने पर प्राणी मन, वचन और कर्म से निर्मल जाएंगे. कूप की महिमा कहते हुए सब लोग वहां गए जहां श्रीरघुनाथजी थे. श्रीरघुनाथजी को अत्रिजी ने उस तीर्थ का पुण्य प्रभाव सुनाया.


प्रेमपूर्वक धर्म के इतिहास कहते वह रात सुख से बीत गई और सबेरा हो गया. भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई नित्यक्रिया पूरी करके, श्रीरामजी, अत्रिजी और गुरु वसिष्ठजी की आज्ञा पाकर, समाजसहित सब सादे साज से श्रीरामजी के वन में भ्रमण करने के लिए पैदल ही चले. कोमल चरण हैं और बिना जूते के चल रहे हैं, यह देखकर पृथ्वी मन-ही-मन सकुचाकर कोमल हो गई. कुश, कांटे, कंकड़ी, दरारें आदि कड़वी, कठोर और बुरी वस्तुओं को छिपाकर पृथ्वी ने सुंदर और कोमल मार्ग कर दिए. सुखों को साथ लिए (सुखदायक) शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा चलने लगी. रास्ते में देवता फूल बरसाकर, बादल छाया करके, वृक्ष फूल-फलकर, तृण अपनी कोमलता से, मृग देखकर और पक्षी सुंदर वाणी बोलकर- सभी भरतजी को श्रीरामचंद्रजी के प्यारे जानकर उनकी सेवा करने लगे. जब एक साधारण मनुष्य को भी आलस्य से जंभाई लेते समय ‘राम’ कह देने से ही सब सिद्धियां सुलभ हो जाती हैं, तब श्रीरामचंद्रजी के प्राणप्यारे भरतजी के लिए यह कोई बड़ी आश्चर्य की बात नहीं है. इस प्रकार भरतजी वन में फिर रहे हैं. उनके नियम और प्रेम को देखकर मुनि भी सकुचा जाते हैं. पवित्र जल के स्थान ( नदी, बावली, कुंड आदि), पृथ्वी के पृथक-पृथक भाग, पक्षी, पशु, वृक्ष, तृण (घास), पर्वत, वन और बगीचे सभी विशेषरूप से सुंदर, विचित्र, पवित्र और दिव्य देखकर भरतजी पूछते हैं और उनका प्रश्न सुनकर ऋषिराज अत्रिजी प्रसन्न मन से सबके कारण, नाम, गुण और पुण्य-प्रभाव को कहते हैं.

भरतजी कहीं स्नान करते हैं, कहीं प्रणाम करते हैं, कहीं मनोहर स्थानों के दर्शन करते हैं और कहीं मुनि अत्रिजी की आज्ञा पाकर बैठकर, सीताजीसहित श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयों का स्मरण करते हैं. भरतजी के स्वभाव, प्रेम और सुंदर सेवाभाव को देखकर वनदेवता आनन्दित होकर आशीर्वाद देते हैं. यों घूम-फिरकर ढाई पहर दिन बीतने पर लौट पड़ते हैं और आकर प्रभु श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों का दर्शन करते हैं. भरतजीने पांच दिन में सब तीर्थस्थानों के दर्शन कर लिए.भगवान विष्णु और महादेवजी का सुंदर यश कहते-सुनते वह (पांचवां) दिन भी बीत गया, सन्ध्या हो गई. अगले छठे दिन सबेरे स्नान करके भरतजी, ब्राह्मण, राजा जनक और सारा समाज आ जुटा. आज सबको विदा करने के लिए अच्छा दिन है, यह मन में जानकर भी कृपालु श्रीरामजी कहने में सकुचा रहे हैं. श्रीरामचंद्रजी ने गुरु वसिष्ठजी, राजा जनकजी, भरतजी और सारी सभा की ओर देखा, किन्तु फिर सकुचाकर दृष्टि फेरकर वे पृथ्वी की ओर ताकने लगे. सभा उनके शील की सराहना करके सोचती है कि श्रीरामचंद्रजी के समान संकोची स्वामी कहीं नहीं हैं. सुजान भरतजी श्रीरामचंद्रजी का रुख देखकर प्रेमपूर्वक उठकर, विशेषरूप से धीरज धारणकर दंडवत करके हाथ जोड़कर कहने लगे- हे नाथ! आपने मेरी सभी रुचियां रखीं.

मेरे लिए सब लोगों ने सन्ताप सहा और आपने भी बहुत प्रकार से दुख पाया. अब स्वामी मुझे आज्ञा दें. मैं जाकर अवधिभर (चौदह वर्ष तक) अवध का सेवन करूं. हे दीनदयालु! जिस उपाय से यह दास फिर चरणों का दर्शन करे- हे कोसलाधीश! हे कृपालु! अवधिभर के लिए मुझे वही शिक्षा दीजिए. हे गोसाईं! आपके प्रेम और सम्बन्ध से अवधपुरवासी, कुटुम्बी और प्रजा सभी पवित्र और रस (आनंद) से युक्त हैं. आपके लिए भवदुख (जन्म-मरणके दुख) की ज्वाला में जलना भी अच्छा है और प्रभु (आप) के बिना परमपद (मोक्ष) का लाभ भी व्यर्थ है. हे स्वामी! आप सुजान हैं, सभी के हृदय की और मुझ सेवक के मनकी रुचि, लालसा (अभिलाषा) और रहनी जानकर, हे प्रणतपाल! आप सब किसी का पालन करेंगे और हे देव! दोनों तरफ को ओर-अन्त तक निभाएंगे. मुझे सब प्रकार से ऐसा बहुत बड़ा भरोसा है. विचार करने पर तिनके के बराबर (जरा-सा) भी सोच नहीं रह जाता. मेरी दीनता और स्वामी का स्नेह दोनों ने मिलकर मुझे जबर्दस्ती ढीठ बना दिया है. हे स्वामी! इस बड़े दोष को दूर करके संकोच त्यागकर मुझ सेवक को शिक्षा दीजिए. दूध और जल को अलग-अलग करने में हंसिनी की-सी गतिवाली भरतजी की विनती सुनकर उसकी सभी ने प्रशंसा की. दीनबन्धु और परम चतुर श्रीरामजी भाई भरतजी के दीन और छलरहित वचन सुनकर देश, काल और अवसर के अनुकूल वचन बोले- हे तात! तुम्हारी, मेरी, परिवार की, घर की और वन की सारी चिन्ता गुरु वसिष्ठजी और महाराज जनकजी को है. हमारे सिरपर जब गुरुजी, मुनि विश्वामित्रजी और मिथिलापति जनकजी हैं, तब हमें और तुम्हें स्वप्न में भी क्लेश नहीं है.


मेरा और तुम्हारा तो परम पुरुषार्थ, स्वार्थ, सुयश, धर्म और परमार्थ इसी में है कि हम दोनों भाई पिताजी की आज्ञा का पालन करें. राजा की भलाई (उनके व्रत की रक्षा) से ही लोक और वेद दोनों में भला है. गुरु, पिता, माता और स्वामी की शिक्षा (आज्ञा) का पालन करने से कुमार्ग पर भी चलने से पैर गड्ढे में नहीं पड़ता (पतन नहीं होता). ऐसा विचारकर सब सोच छोड़कर अवध जाकर अवधि भर उसका पालन करो. देश, खजाना, कुटुम्ब, परिवार आदि सबकी जिम्मेदारी तो गुरुजी की चरण-रजपर है. तुम तो मुनि वसिष्ठजी, माताओं और मन्त्रियों की शिक्षा मानकर तदनुसार पृथ्वी, प्रजा और राजधानी का पालन (रक्षा) भर करते रहना. श्रीरामजी ने कहा- मुखिया मुख के समान होना चाहिए, जो खाने-पीने को तो एक (अकेला) है, परंतु विवेकपूर्वक सब अंगों का पालन-पोषण करता है. राजधर्म का सर्वस्व (सार) भी इतना ही है. जैसे मन के भीतर मनोरथ छिपा रहता है. श्रीरघुनाथजी ने भाई भरत को बहुत प्रकार से समझाया. परंतु कोई अवलम्बन पाए बिना उनके मन में न सन्तोष हुआ, न शान्ति.

इधर तो भरतजी का शील (प्रेम) और उधर गुरुजनों, मन्त्रियों तथा समाज की उपस्थिति! यह देखकर श्रीरघुनाथजी संकोच तथा स्नेह के विशेष वशीभूत हो गए.आखिर भरतजी के प्रेमवश प्रभु श्रीरामचंद्रजी ने कृपाकर खड़ाऊं दे दीं और भरतजी ने उन्हें आदरपूर्वक सिरपर धारण कर लिया. करुणानिधान श्रीरामचंद्रजी के दोनों खड़ाऊं प्रजा के प्राणों की रक्षा के लिए मानो दो पहरेदार हैं. भरतजी के प्रेमरूपी रत्न के लिए मानो डिब्बा है और जीव के साधन के लिए मानो राम-नाम के दो अक्षर हैं. रघुकुल की रक्षा के लिए दो किवाड़ हैं. कुशल कर्म करने के लिए दो हाथ की भांति हैं. और सेवारूपी श्रेष्ठ धर्म के सुझाने के लिए निर्मल नेत्र हैं. भरतजी इस अवलम्ब के मिल जाने से परम आनन्दित हैं. उन्हें ऐसा ही सुख हुआ, जैसा श्रीसीतारामजी के रहने से होता. भरतजी ने प्रणाम करके विदा मांगी, तब श्रीरामचंद्रजी ने उन्हें हृदय से लगा लिया. इधर कुटिल इन्द्र ने बुरा मौका पाकर लोगों का उच्चाटन कर दिया. वह कुचाल भी सबके लिए हितकर हो गई. अवधि की आशा के समान ही वह जीवन के लिए संजीवनी हो गई. नहीं तो उच्चाटन न होता तो लक्ष्मणजी, सीताजी और श्रीरामचंद्रजी के वियोगरूपी बुरे रोग से सब लोग घबड़ाकर (हाय-हाय करके) मर ही जाते. श्रीरामजी की कृपा ने सारी उलझन सुधार दी. देवताओं की सेना जो लूटने आई थी, वही गुणदायक (हितकारी) और रक्षक बन गई. श्रीरामजी भुजाओं में भरकर भाई भरत से मिल रहे हैं. श्रीरामजी के प्रेम का वह रस (आनंद) कहते नहीं बनता. 

तन, मन और वचन तीनों में प्रेम उमड़ पड़ा. धीरज की धुरी को धारण करने वाले श्रीरघुनाथजी ने भी धीरज त्याग दिया. वे कमलसदृश नेत्रों से प्रेमाश्रुओं का जल बहाने लगे. उनकी यह दशा देखकर देवताओं की सभा (समाज) दुखी हो गई. मुनिगण, गुरु वसिष्ठजी और जनकजी सरीखे धीरधुरन्धर जो अपने मनों को ज्ञानरूपी अग्नि में सोने के समान कस चुके थे, जिनको ब्रह्माजी ने निर्लेप ही रचा और जो जगत्रूपी जल में कमल के पत्ते की तरह ही पैदा हुए, वे भी श्रीरामजी और भरतजी के उपमारहित अपार प्रेम को देखकर वैराग्य और विवेकसहित तन, मन, वचन से उस प्रेम में मग्न हो गए, जहां जनकजी और गुरु वसिष्ठजी की बुद्धिकी गति कुंठित हो गई, उस दिव्य प्रेम को प्राकृत (लौकिक) कहने में बड़ा दोष है. श्रीरामचंद्रजी और भरतजी के वियोग का वर्णन करते सुनकर लोग कवि को कठोरहृदय समझेंगे. वह संकोच-रस अकथनीय है. अतएव कवि की सुंदर वाणी उस समय उसके प्रेम को स्मरण करके सकुचा गई. भरतजी को भेंटकर श्रीरघुनाथजी ने उनको समझाया. फिर हर्षित होकर शत्रुघ्नजी को हृदय से लगा लिया. सेवक और मन्त्री भरतजी का रुख पाकर सब अपने-अपने काम में जा लगे. यह सुनकर दोनों समाजों में दारुण दुख छा गया. वे चलने की तैयारियां करने लगे. प्रभु के चरणकमलों की वन्दना करके तथा श्रीरामजी की आज्ञा को सिरपर रखकर भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चले. मुनि, तपस्वी और वन देवता सबका बार-बार सम्मान करके उनकी विनती की.


फिर लक्ष्मणजी को क्रमशः भेंटकर तथा प्रणाम करके और सीताजी के चरणों की धूलि को सिर पर धारण करके और समस्त मंगलों के मूल आशीर्वाद सुनकर वे प्रेमसहित चले. छोटे भाई लक्ष्मणजी समेत श्रीरामजी ने राजा जनकजी को सिर नवाकर उनकी बहुत प्रकार से विनती और बड़ाई की और कहा- हे देव! दयावश आपने बहुत दुख पाया. आप समाज सहित वन में आए.अब आशीर्वाद देकर नगर को पधारिए. यह सुन राजा जनकजी ने धीरज धरकर गमन किया. फिर श्रीरामचंद्रजी ने मुनि, ब्राह्मण और साधुओं को विष्णु और शिव के समान जानकर सम्मान करके उनको विदा किया. तब श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाई सास (सुनयनाजी) के पास गए और उनके चरणों की वन्दना करके आशीर्वाद पाकर लौट आए. फिर विश्वामित्र, वामदेव, जाबालि और शुभ आचरण वाले कुटुम्बी, नगरनिवासी और मन्त्री सबको छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित श्रीरामचंद्रजी ने यथायोग्य विनय एवं प्रणाम करके विदा किया. कृपानिधान श्रीरामचंद्रजी ने छोटे, मझले और बड़े सभी श्रेणी के स्त्री-पुरुषों का सम्मान करके उनको लौटाया. भरत की माता कैकेयी के चरणों की वन्दना करके प्रभु श्रीरामचंद्रजी ने पवित्र प्रेम के साथ उनसे मिल-भेंटकर तथा उनके सारे संकोच और सोच को मिटाकर पालकी सजाकर उनको विदा किया. प्राणप्रिय पति श्रीरामचंद्रजी के साथ पवित्र प्रेम करने वाली सीताजी नैहर के कुटुम्बियों से तथा माता-पिता से मिलकर लौट आईं. फिर प्रणाम करके सब सासों से गले लगकर मिलीं. उनके प्रेम का वर्णन करने के लिए कवि के हृदय में हुलास (उत्साह) नहीं होता.

उनकी शिक्षा सुनकर और मनचाहा आशीर्वाद पाकर सीताजी सासों तथा माता-पिता दोनों ओर की प्रीति में समाई रहीं! तब श्रीरघुनाथजी ने सुंदर पालकियां मंगवाईं और सब माताओं को आश्वासन देकर उन पर चढ़ाया. दोनों भाइयों ने माताओं से समान प्रेम से बार-बार मिल-जुलकर उनको पहुंचाया. भरतजी और राजा जनकजी के दलों ने घोड़े, हाथी और अनेकों तरह की सवारियां सजाकर प्रस्थान किया. सीताजी एवं लक्ष्मणजी सहित श्रीरामचंद्रजी को हृदय में रखकर सब लोग बेसुध हुए चले जा रहे हैं. बैल, घोड़े, हाथी आदि पशु हृदय में हारे (शिथिल) हुए परवश मनमारे चले जा रहे हैं. गुरु वसिष्ठजी और गुरुपत्नी अरुन्धतीजी के चरणों की वन्दना करके सीताजी और लक्ष्मणजी सहित प्रभु श्रीरामचंद्रजी हर्ष और विषाद के साथ लौटकर पर्णकुटी पर आए. फिर सम्मान करके निषादराज को विदा किया. वह चला तो सही, किन्तु उसके हृदय में विरह का बड़ा भारी विषाद था. फिर श्रीरामजी ने कोल, किरात, भील आदि वनवासी लोगों को लौटाया. वे सब जोहार-जोहारकर लौटे. प्रभु श्रीरामचंद्रजी, सीताजी और लक्ष्मणजी बड़ की छाया में बैठकर प्रियजन एवं परिवार के वियोग से दुखी हो रहे हैं. भरतजी के स्नेह, स्वभाव और सुंदर वाणी को बखान-बखानकर वे प्रिय पत्नी सीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजी से कहने लगे.

श्रीरामचंद्रजी ने प्रेम के वश होकर भरतजी के वचन, मन, कर्म की प्रीति तथा विश्वास का अपने श्रीमुख से वर्णन किया. उस समय पक्षी, पशु और जलकी मछलियां, चित्रकूट के सभी चेतन और जड़ जीव उदास हो गए. श्रीरघुनाथजी की दशा देखकर देवताओं ने उनपर फूल बरसाकर अपनी घर-घर की दशा कही. प्रभु श्रीरामचंद्रजी ने उन्हें प्रणाम कर आश्वासन दिया. तब वे प्रसन्न होकर चले, मन में जरा-सा भी डर न रहा. छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजी समेत प्रभु श्रीरामचंद्रजी पर्णकुटी में ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो वैराग्य, भक्ति और ज्ञान शरीर धारण करके शोभित हो रहे हों. मुनि, ब्राह्मण, गुरु वसिष्ठजी, भरतजी और राजा जनकजी सारा समाज श्रीरामचंद्रजी के विरह में विह्वल है. प्रभु के गुणसमूहों का मन में स्मरण करते हुए सब लोग मार्ग में चुपचाप चले जा रहे हैं. पहले दिन सब लोग यमुनाजी उतरकर पार हुए. वह दिन बिना भोजन के ही बीत गया. दूसरा मुकाम गंगाजी पार कर श्रृंगवेरपुर में हुआ. वहां रामसखा निषादराज ने सब सुप्रबन्ध कर दिया. फिर सई उतरकर गोमतीजी में स्नान किया और चौथे दिन सब अयोध्याजी जा पहुंचे. जनकजी चार दिन अयोध्याजी में रहे और राजकाज एवं सब साज-सामान को संभालकर तथा मन्त्री, गुरुजी तथा भरतजी को राज्य सौंपकर, सारा साज-सामान ठीक करके तिरहुत को चले. नगर के स्त्री-पुरुष गुरुजी की शिक्षा मानकर श्रीरामजी की राजधानी अयोध्याजी में सुखपूर्वक रहने लगे.

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