रामचरित मानस खंड-21: जब सुग्रीव पर क्रोधित हो गए थे श्रीराम, लक्ष्मणजी से कही थी ये बात

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(राम आ चुके हैं…जी हां, सदियों के लंबे इंतजार के बाद भव्य राम मंदिर बनकर तैयार है और प्रभु श्रीराम अपनी पूरी भव्यता-दिव्यता के साथ उसमें विराजमान हो गए हैं. इस पावन अवसर पर aajtak.in अपने पाठकों के लिए लाया है तुलसीदास द्वारा अवधी में लिखी गई राम की कथा का हिंदी रूपांतरण (साभारः गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीरामचरितमानस).  इस श्रृंखला ‘रामचरित मानस’ में आप पढ़ेंगे भगवान राम के जन्म से लेकर लंका पर विजय तक की पूरी कहानी. आज पेश है इसका 21वां खंड…)


सुग्रीम ने श्रीराम को वह सब बताया जो बाली ने उसके साथ किया था. आखिर में सुग्रीव ने श्रीराम से कहा- हे रघुवीर! सुनिए, बाली महान् बलवान् और अत्यंत रणधीर है. फिर सुग्रीव ने श्री रामजी को दुंदुभि राक्षस की हड्डियां व ताल के वृक्ष दिखलाए. श्री रघुनाथजी ने उन्हें बिना ही परिश्रम के आसानी से ढहा दिया. श्री रामजी का अपरिमित बल देखकर सुग्रीव की प्रीति बढ़ गई और उन्हें विश्वास हो गया कि ये बालि का वध अवश्य करेंगे. वे बार-बार चरणों में सिर नवाने लगे. प्रभु को पहचानकर सुग्रीव मन में हर्षित हो रहे थे. जब ज्ञान उत्पन्न हुआ तब वे ये वचन बोले कि हे नाथ! आपकी कृपा से अब मेरा मन स्थिर हो गया. सुख, संपत्ति, परिवार और बड़ाई (बड़प्पन) सबको त्यागकर मैं आपकी सेवा ही करूंगा. क्योंकि आपके चरणों की आराधना करने वाले संत कहते हैं कि ये सब (सुख-संपत्ति आदि) राम भक्ति के विरोधी हैं. जगत में जितने भी शत्रु-मित्र और सुख-दुःख (आदि द्वंद्व) हैं, सब के सब मायारचित हैं, परमार्थतः (वास्तव में) नहीं हैं. हे श्री रामजी! बाली तो मेरा परम हितकारी है, जिसकी कृपा से शोक का नाश करने वाले आप मुझे मिले और जिसके साथ अब स्वप्न में भी लड़ाई हो तो जागने पर उसे समझकर मन में संकोच होगा कि स्वप्न में भी मैं उससे क्यों लड़ा.

हे प्रभो अब तो इस प्रकार कृपा कीजिए कि सब छोड़कर दिन-रात मैं आपका भजन ही करूं. सुग्रीव की वैराग्ययुक्त वाणी सुनकर (उसके क्षणिक वैराग्य को देखकर) हाथ में धनुष धारण करने वाले श्री रामजी मुस्कुराकर बोले- तुमने जो कुछ कहा है, वह सभी सत्य है, परंतु हे सखा! मेरा वचन मिथ्या नहीं होता (अर्थात् बाली मारा जाएगा और तुम्हें राज्य मिलेगा). तदंतर सुग्रीव को साथ लेकर और हाथों में धनुष-बाण धारण करके श्री रघुनाथजी चले. तब श्री रघुनाथजी ने सुग्रीव को बाली के पास भेजा. वह श्री रामजी का बल पाकर बाली के निकट जाकर गरजा. बाली सुनते ही क्रोध में भरकर वेग से दौड़ा. उसकी स्त्री तारा ने चरण पकड़कर उसे समझाया कि हे नाथ! सुनिए, सुग्रीव जिनसे मिले हैं वे दोनों भाई तेज और बल की सीमा हैं. वे कोसलाधीश दशरथजी के पुत्र राम और लक्ष्मण संग्राम में काल को भी जीत सकते हैं.

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बाली ने कहा- हे भीरु! (डरपोक) प्रिए! सुनो, श्री रघुनाथजी समदर्शी हैं. जो कदाचित् वे मुझे मारेंगे ही तो मैं सनाथ हो जाऊंगा (परमपद पा जाऊंगा). ऐसा कहकर वह महान्‌ अभिमानी बाली सुग्रीव को तिनके के समान जानकर चला. दोनों भिड़ गए. बाली ने सुग्रीव को बहुत धमकाया और घूंसा मारकर बड़े जोर से गरजा. तब सुग्रीव व्याकुल होकर भागा. घूंसे की चोट उसे वज्र के समान लगी. सुग्रीव ने आकर कहा- हे कृपालु रघुवीर! मैंने आपसे पहले ही कहा था कि बाली मेरा भाई नहीं है, काल है. श्री रामजी ने कहा- तुम दोनों भाइयों का एक सा ही रूप है. इसी भ्रम से मैंने उसको नहीं मारा. फिर श्री रामजी ने सुग्रीव के शरीर को हाथ से स्पर्श किया, जिससे उसका शरीर वज्र के समान हो गया और सारी पीड़ा जाती रही. तब श्री रामजी ने सुग्रीव के गले में फूलों की माला डाल दी और फिर उसे बड़ा भारी बल देकर भेजा. दोनों में पुनः अनेक प्रकार से युद्ध हुआ. श्री रघुनाथजी वृक्ष की आड़ से देख रहे थे. सुग्रीव ने बहुत से छल-बल किए, किंतु (अंत में) भय मानकर हृदय से हार गया. तब श्री रामजी ने तानकर बाली के हृदय में बाण मारा.


बाण के लगते ही बाली व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, किंतु प्रभु श्री रामचंद्रजी को आगे देखकर वह फिर उठ बैठा. भगवान्‌ का श्याम शरीर है, सिर पर जटा बनाए हैं, लाल नेत्र हैं, बाण लिए हैं और धनुष चढ़ाए हैं. बाली ने बार-बार भगवान् की ओर देखकर चित्त को उनके चरणों में लगा दिया. प्रभु को पहचानकर उसने अपना जन्म सफल माना. उसके हृदय में प्रीति थी, पर मुख में कठोर वचन थे. वह श्री रामजी की ओर देखकर बोला- हे गोसाईं. आपने धर्म की रक्षा के लिए अवतार लिया है और मुझे व्याध की तरह (छिपकर) मारा? मैं बैरी और सुग्रीव प्यारा? हे नाथ! किस दोष से आपने मुझे मारा? श्री रामजी ने कहा- हे मूर्ख! सुन, छोटे भाई की स्त्री, बहिन, पुत्र की स्त्री और कन्या- ये चारों समान हैं. इनको जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है, उसे मारने में कुछ भी पाप नहीं होता. हे मूढ़! तुझे अत्यंत अभिमान है. तूने अपनी स्त्री की सीख पर भी कान (ध्यान) नहीं दिया. सुग्रीव को मेरी भुजाओं के बल का आश्रित जानकर भी अरे अधम अभिमानी! तूने उसको मारना चाहा. बाली ने कहा- हे श्री रामजी! सुनिए, स्वामी (आप) से मेरी चतुराई नहीं चल सकती. हे प्रभो! अंतकाल में आपकी गति (शरण) पाकर मैं अब भी पापी ही रहा?

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बाली की अत्यंत कोमल वाणी सुनकर श्री रामजी ने उसके सिर को अपने हाथ से स्पर्श किया और कहा- मैं तुम्हारे शरीर को अचल कर दूं, तुम प्राणों को रखो. बाली ने कहा- हे कृपानिधान! सुनिए. मुनिगण जन्म-जन्म में (प्रत्येक जन्म में) अनेकों प्रकार का साधन करते रहते हैं. फिर भी अंतकाल में उन्हें ‘राम’ नहीं कह आता (उनके मुख से राम नाम नहीं निकलता). जिनके नाम के बल से शंकरजी काशी में सबको समान रूप से अविनाशिनी गति (मुक्ति) देते हैं. वह श्री रामजी स्वयं मेरे नेत्रों के सामने आ गए हैं. हे प्रभो! ऐसा संयोग क्या फिर कभी बन पड़ेगा. श्रुतियां ‘नेति-नेति’ कहकर निरंतर जिनका गुणगान करती रहती हैं तथा प्राण और मन को जीतकर एवं इंद्रियों को (विषयों के रस से सर्वथा) नीरस बनाकर मुनिगण ध्यान में जिनकी कभी ही झलक पाते हैं, वे ही प्रभु (आप) साक्षात् मेरे सामने प्रकट हैं. आपने मुझे अत्यंत अभिमानवश जानकर यह कहा कि तुम शरीर रख लो, परंतु ऐसा मूर्ख कौन होगा जो हठपूर्वक कल्पवृक्ष को काटकर उससे बबूर के बाड़ लगाएगा (अर्थात्‌ पूर्णकाम बना देने वाले आपको छोड़कर आपसे इस नश्वर शरीर की रक्षा चाहेगा?)


हे नाथ! अब मुझ पर दयादृष्टि कीजिए और मैं जो वर मांगता हूं उसे दीजिए. मैं कर्मवश जिस योनि में जन्म लूं, वहीं श्री रामजी (आप) के चरणों में प्रेम करूं! हे कल्याणप्रद प्रभो! यह मेरा पुत्र अंगद विनय और बल में मेरे ही समान है, इसे स्वीकार कीजिए और हे देवता और मनुष्यों के नाथ! बांह पकड़कर इसे अपना दास बनाइए. श्री रामजी के चरणों में दृढ़ प्रीति करके बाली ने शरीर को वैसे ही (आसानी से) त्याग दिया जैसे हाथी अपने गले से फूलों की माला का गिरना न जाने. श्री रामचंद्रजी ने बाली को अपने परम धाम भेज दिया. नगर के सब लोग व्याकुल होकर दौड़े. बालि की स्त्री तारा अनेकों प्रकार से विलाप करने लगी. उसके बाल बिखरे हुए हैं और देह की संभाल नहीं है.

तारा को व्याकुल देखकर श्री रघुनाथजी ने उसे ज्ञान दिया और उसकी माया (अज्ञान) हर ली. उन्होंने कहा- पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु- इन पांच तत्वों से यह अत्यंत अधम शरीर रचा गया है. वह शरीर तो प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने सोया हुआ है, और जीव नित्य है. फिर तुम किसके लिए रो रही हो? जब ज्ञान उत्पन्न हो गया, तब वह भगवान् के चरणों लगी और उसने परम भक्ति का वर मांग लिया. तदनंतर श्री रामजी ने सुग्रीव को आज्ञा दी और सुग्रीव ने विधिपूर्वक बाली का सब मृतक कर्म किया. तब श्री रामचंद्रजी ने छोटे भाई लक्ष्मण को समझाकर कहा कि तुम जाकर सुग्रीव को राज्य दे दो. श्री रघुनाथजी की प्रेरणा (आज्ञा) से सब लोग श्री रघुनाथजी के चरणों में मस्तक नवाकर चले. लक्ष्मणजी ने तुरंत ही सब नगरवासियों को और ब्राह्मणों के समाज को बुला लिया और उनके सामने सुग्रीव को राज्य और अंगद को युवराज पद दिया.

 

 

जगत में श्री रामजी के समान हित करने वाला गुरु, पिता, माता, बंधु और स्वामी कोई नहीं है. देवता, मनुष्य और मुनि सबकी यह रीति है कि स्वार्थ के लिए ही सब प्रीति करते हैं. जो सुग्रीव दिन-रात बाली के भय से व्याकुल रहता था, जिसके शरीर में बहुत से घाव हो गए थे और जिसकी छाती चिंता के मारे जला करती थी, उसी सुग्रीव को उन्होंने वानरों का राजा बना दिया. श्री रामचंद्रजी का स्वभाव अत्यंत ही कृपालु है. जो लोग जानते हुए भी ऐसे प्रभु को त्याग देते हैं, वे क्यों न विपत्ति के जाल में फंसें? फिर श्री रामजी ने सुग्रीव को बुला लिया और बहुत प्रकार से उन्हें राजनीति की शिक्षा दी. फिर प्रभु ने कहा- हे वानरपति सुग्रीव! सुनो, मैं चौदह वर्ष तक गांव (बस्ती) में नहीं जाऊंगा. ग्रीष्मऋतु बीतकर वर्षाऋतु आ गई. अतः मैं यहां पास ही पर्वत पर टिका रहूंगा. तुम अंगद सहित राज्य करो. मेरे काम का हृदय में सदा ध्यान रखना. तदनन्तर जब सुग्रीवजी घर लौट आए, तब श्री रामजी प्रवर्षण पर्वत पर जा टिके.


देवताओं ने पहले से ही उस पर्वत की एक गुफा को सुंदर बना (सजा) रखा था. उन्होंने सोच रखा था कि कृपा की खान श्री रामजी कुछ दिन यहां आकर निवास करेंगे. सुंदर वन फूला हुआ अत्यंत सुशोभित है. मधु के लोभ से भौंरों के समूह गुंजार कर रहे हैं. जब से प्रभु आए, तब से वन में सुंदर कन्द, मूल, फल और पत्तों की बहुतायत हो गई. मनोहर और अनुपम पर्वत को देखकर देवताओं के सम्राट श्री रामजी छोटे भाई सहित वहां रह गए. देवता, सिद्ध और मुनि भौंरों, पक्षियों और पशुओं के शरीर धारण करके प्रभु की सेवा करने लगे. जब से रमापति श्री रामजी ने वहां निवास किया तब से वन मंगलस्वरूप हो गया. सुंदर स्फटिक मणि की एक अत्यंत उज्ज्वल शिला है, उस पर दोनों भाई सुखपूर्वक विराजमान हैं. श्री राम छोटे भाई लक्ष्मणजी से भक्ति, वैराग्य, राजनीति और ज्ञान की अनेकों कथाएं कहते हैं. वर्षाकाल में आकाश में छाए हुए बादल गरजते हुए बहुत ही सुहावने लगते हैं.

श्री रामजी कहने लगे- हे लक्ष्मण! देखो, मोरों के झुंड बादलों को देखकर नाच रहे हैं जैसे वैराग्य में अनुरक्त गृहस्थ किसी विष्णुभक्त को देखकर हर्षित होते हैं. आकाश में बादल घुमड़-घुमड़कर घोर गर्जना कर रहे हैं, प्रिया (सीताजी) के बिना मेरा मन डर रहा है. बिजली की चमक बादलों में ठहरती नहीं, जैसे दुष्ट की प्रीति स्थिर नहीं रहती. बादल पृथ्वी के समीप आकर (नीचे उतरकर) बरस रहे हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान्‌ नम्र हो जाते हैं. बूंदों की चोट पर्वत कैसे सहते हैं, जैसे दुष्टों के वचन संत सहते हैं. छोटी नदियां भरकर (किनारों को) तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े धन से भी दुष्ट इतरा जाते हैं. पृथ्वी पर पड़ते ही पानी गंदला हो गया है, जैसे शुद्ध जीव के माया लिपट गई हो. जल एकत्र हो-होकर तालाबों में भर रहा है, जैसे सद्गुण (एक-एककर) सज्जन के पास चले आते हैं. नदी का जल समुद्र में जाकर वैसे ही स्थिर हो जाता है, जैसे जीव श्री हरि को पाकर अचल (आवागमन से मुक्त) हो जाता है. पृथ्वी घास से परिपूर्ण होकर हरी हो गई है, जिससे रास्ते समझ नहीं पड़ते. जैसे पाखंड मत के प्रचार से सद्ग्रंथ गुप्त (लुप्त) हो जाते हैं. चारों दिशाओं में मेंढकों की ध्वनि ऐसी सुहावनी लगती है, मानो विद्यार्थियों के समुदाय वेद पढ़ रहे हों. अनेकों वृक्षों में नए पत्ते आ गए हैं, जिससे वे ऐसे हरे-भरे एवं सुशोभित हो गए हैं जैसे साधक का मन विवेक (ज्ञान) प्राप्त होने पर हो जाता है. मदार और जवासा बिना पत्ते के हो गए (उनके पत्ते झड़ गए). जैसे श्रेष्ठ राज्य में दुष्टों का उद्यम जाता रहा (उनकी एक भी नहीं चलती). धूल कहीं खोजने पर भी नहीं मिलती, जैसे क्रोध धर्म को दूर कर देता है.

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अन्न से युक्त (लहराती हुई खेती से हरी-भरी) पृथ्वी कैसी शोभित हो रही है, जैसी उपकारी पुरुष की संपत्ति. रात के घने अंधकार में जुगनू शोभा पा रहे हैं, मानो दम्भियों का समाज आ जुटा हो. भारी वर्षा से खेतों की क्यारियां फूट चली हैं, जैसे स्वतंत्र होने से स्त्रियां बिगड़ जाती हैं. चतुर किसान खेतों को निरा रहे हैं (उनमें से घास आदि को निकालकर फेंक रहे हैं.) जैसे विद्वान्‌ लोग मोह, मद और मान का त्याग कर देते हैं. चक्रवाक पक्षी दिखाई नहीं दे रहे हैं, जैसे कलियुग को पाकर धर्म भाग जाते हैं. ऊसर में वर्षा होती है, पर वहां घास तक नहीं उगती. जैसे हरिभक्त के हृदय में काम नहीं उत्पन्न होता. पृथ्वी अनेक तरह के जीवों से भरी हुई उसी तरह शोभायमान है, जैसे सुराज्य पाकर प्रजा की वृद्धि होती है. जहां-तहां अनेक पथिक थककर ठहरे हुए हैं, जैसे ज्ञान उत्पन्न होने पर इंद्रियां शिथिल होकर विषयों की ओर जाना छोड़ देती हैं. कभी-कभी वायु बड़े जोर से चलने लगती है, जिससे बादल जहां-तहां गायब हो जाते हैं. जैसे कुपुत्र के उत्पन्न होने से कुल के उत्तम धर्म (श्रेष्ठ आचरण) नष्ट हो जाते हैं. कभी (बादलों के कारण) दिन में घोर अंधकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रकट हो जाते हैं. जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है.


हे लक्ष्मण! देखो, वर्षा बीत गई और परम सुंदर शरद् ऋतु आ गई. फूले हुए कास से सारी पृथ्वी छा गई. मानो वर्षा ऋतु ने (कास रूपी सफेद बालों के रूप में) अपना बुढ़ापा प्रकट किया है. अगस्त्य के तारे ने उदय होकर मार्ग के जल को सोख लिया, जैसे संतोष लोभ को सोख लेता है. नदियों और तालाबों का निर्मल जल ऐसी शोभा पा रहा है जैसे मद और मोह से रहित संतों का हृदय! नदी और तालाबों का जल धीरे-धीरे सूख रहा है. जैसे ज्ञानी (विवेकी) पुरुष ममता का त्याग करते हैं. शरद ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गए. जैसे समय पाकर सुंदर सुकृत आ सकते हैं. (पुण्य प्रकट हो जाते हैं). न कीचड़ है न धूल? इससे धरती (निर्मल होकर) ऐसी शोभा दे रही है जैसे नीतिनिपुण राजा की करनी! जल के कम हो जाने से मछलियां व्याकुल हो रही हैं, जैसे मूर्ख (विवेक शून्य) कुटुम्बी (गृहस्थ) धन के बिना व्याकुल होता है. बिना बादलों का निर्मल आकाश ऐसा शोभित हो रहा है जैसे भगवद्भक्त सब आशाओं को छोड़कर सुशोभित होते हैं. कहीं-कहीं (विरले ही स्थानों में) शरद् ऋतु की थोड़ी-थोड़ी वर्षा हो रही है. जैसे कोई विरले ही मेरी भक्ति पाते हैं. शरद् ऋतु पाकर राजा, तपस्वी, व्यापारी और भिखारी (क्रमशः विजय, तप, व्यापार और भिक्षा के लिए) हर्षित होकर नगर छोड़कर चले. जैसे श्री हरि की भक्ति पाकर चारों आश्रम वाले (नाना प्रकार के साधन रूपी) श्रमों को त्याग देते हैं. 

जो मछलियां अथाह जल में हैं, वे सुखी हैं, जैसे श्री हरि के शरण में चले जाने पर एक भी बाधा नहीं रहती. कमलों के फूलने से तालाब कैसी शोभा दे रहा है, जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण होने पर शोभित होता है. भौंरे अनुपम शब्द करते हुए गूंज रहे हैं तथा पक्षियों के नाना प्रकार के सुंदर शब्द हो रहे हैं. रात्रि देखकर चकवे के मन में वैसे ही दुःख हो रहा है, जैसे दूसरे की संपत्ति देखकर दुष्ट को होता है. पपीहा रट लगाए है, उसको बड़ी प्यास है, जैसे श्री शंकरजी का द्रोही सुख नहीं पाता (सुख के लिए झीखता रहता है) शरद् ऋतु के ताप को रात के समय चंद्रमा हर लेता है, जैसे संतों के दर्शन से पाप दूर हो जाते हैं. वर्षा ऋतु के कारण पृथ्वी पर जो जीव भर गए थे, वे शरद् ऋतु को पाकर वैसे ही नष्ट हो गए जैसे सद्गुरु के मिल जाने पर संदेह और भ्रम के समूह नष्ट हो जाते हैं.

वर्षा बीत गई, निर्मल शरद्ऋतु आ गई, परंतु हे तात! सीता की कोई खबर नहीं मिली. एक बार कैसे भी पता पाऊं तो काल को भी जीतकर पल भर में जानकी को ले आऊं. कहीं भी रहे, यदि जीती होगी तो हे तात! यत्न करके मैं उसे अवश्य लाऊंगा. राज्य, खजाना, नगर और स्त्री पा गया, इसलिए सुग्रीव ने भी मेरी सुध भुला दी. जिस बाण से मैंने बाली को मारा था, उसी बाण से कल उस मूढ़ को मारूं! लक्ष्मणजी ने जब प्रभु को क्रोधयुक्त जाना, तब उन्होंने धनुष चढ़ाकर बाण हाथ में ले लिए. तब दया की सीमा श्री रघुनाथजी ने छोटे भाई लक्ष्मणजी को समझाया कि हे तात! सखा सुग्रीव को केवल भय दिखलाकर ले आओ. यहां (किष्किन्धा नगरी में) पवनकुमार श्री हनुमानजी ने विचार किया कि सुग्रीव ने श्री रामजी के कार्य को भुला दिया.


उन्होंने सुग्रीव के पास जाकर चरणों में सिर नवाया. (साम, दाम, दंड, भेद) चारों प्रकार की नीति कहकर उन्हें समझाया. हनुमानजी के वचन सुनकर सुग्रीव ने बहुत ही भय माना. और कहा- विषयों ने मेरे ज्ञान को हर लिया. अब हे पवनसुत! जहां-तहां वानरों के दूत रहते हैं, वहां दूतों के समूहों को भेजो. और कहला दो कि एक पखवाड़े में (पंद्रह दिनों में) जो न आ जाएगा, उसका मेरे हाथों वध होगा. तब हनुमानजी ने दूतों को बुलाया और सबका बहुत सम्मान करके- सबको भय, प्रीति और नीति दिखलाई. सब बंदर चरणों में सिर नवाकर चले. इसी समय लक्ष्मणजी नगर में आए. उनका क्रोध देखकर बंदर जहां-तहां भागे. तदंतर लक्ष्मणजी ने धनुष चढ़ाकर कहा कि नगर को जलाकर अभी राख कर दूंगा. तब नगरभर को व्याकुल देखकर बालीपुत्र अंगदजी उनके पास आए. अंगद ने उनके चरणों में सिर नवाकर विनती की, तब लक्ष्मणजी ने उनको अभय बांह दी (भुजा उठाकर कहा कि डरो मत). 

सुग्रीव ने अपने कानों से लक्ष्मणजी को क्रोधयुक्त सुनकर भय से अत्यंत व्याकुल होकर कहा- हे हनुमान सुनो, तुम तारा को साथ ले जाकर विनती करके राजकुमार को समझाओ (समझा-बुझाकर शांत करो). हनुमानजी ने तारा सहित जाकर लक्ष्मणजी के चरणों की वंदना की और प्रभु के सुंदर यश का बखान किया. वे विनती करके उन्हें महल में ले आए तथा चरणों को धोकर उन्हें पलंग पर बैठाया. तब वानरराज सुग्रीव ने उनके चरणों में सिर नवाया और लक्ष्मणजी ने हाथ पकड़कर उनको गले से लगा लिया.

सुग्रीव ने कहा- हे नाथ! विषय के समान और कोई मद नहीं है. यह मुनियों के मन में भी क्षणमात्र में मोह उत्पन्न कर देता है, फिर मैं तो विषई जीव ही ठहरा. सुग्रीव के विनययुक्त वचन सुनकर लक्ष्मणजी ने सुख पाया और उनको बहुत प्रकार से समझाया. तब पवनसुत हनुमानजी ने जिस प्रकार सब दिशाओं में दूतों के समूह गए थे वह सब हाल सुनाया.

 

 

तब अंगद आदि वानरों को साथ लेकर और श्री रामजी के छोटे भाई लक्ष्मणजी को आगे करके (अर्थात्‌ उनके पीछे-पीछे) सुग्रीव हर्षित होकर चले और जहां रघुनाथजी थे वहां आए. श्री रघुनाथजी के चरणों में सिर नवाकर हाथ जोड़कर सुग्रीव ने कहा- हे नाथ! मुझे कुछ भी दोष नहीं है. हे देव! आपकी माया अत्यंत ही प्रबल है. आप जब दया करते हैं, हे राम! तभी यह छूटती है. हे स्वामी! देवता, मनुष्य और मुनि सभी विषयों के वश में हैं. फिर मैं तो पामर पशु और पशुओं में भी अत्यंत कामी बंदर हूं. स्त्री का नयन बाण जिसको नहीं लगा, जो भयंकर क्रोध रूपी अंधेरी रात में भी जागता रहता है. और लोभ की फांसी से जिसने अपना गला नहीं बंधाया, हे रघुनाथजी! वह मनुष्य आप ही के समान है. ए गुण साधन से नहीं प्राप्त होते. आपकी कृपा से ही कोई-कोई इन्हें पाते हैं.


तब श्री रघुनाथजी मुस्कुराकर बोले- हे भाई! तुम मुझे भरत के समान प्यारे हो. अब मन लगाकर वही उपाय करो जिस उपाय से सीता की खबर मिले. इस प्रकार बातचीत हो रही थी कि वानरों के झुंड आ गए. अनेक रंगों के वानरों के दल सब दिशाओं में दिखाई देने लगे. सब वानर आ-आकर श्री रामजी के चरणों में मस्तक नवाते हैं और (सौंदर्य-माधुर्यनिधि) श्रीमुख के दर्शन करके कृतार्थ होते हैं. सेना में एक भी वानर ऐसा नहीं था जिससे श्री रामजी ने कुशल न पूछी हो, प्रभु के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकि श्री रघुनाथजी विश्वरूप तथा सर्वव्यापक हैं (सारे रूपों और सब स्थानों में हैं). आज्ञा पाकर सब जहां-तहां खड़े हो गए. तब सुग्रीव ने सबको समझाकर कहा कि हे वानरों के समूहों! यह श्री रामचंद्रजी का कार्य है और मेरा निहोरा (अनुरोध) है, तुम चारों ओर जाओ. और जाकर जानकीजी को खोजो. हे भाई! महीने भर में वापस आ जाना. जो महीने भर की अवधि बिताकर बिना पता लगाए ही लौट आएगा उसे मेरे द्वारा मरवाते ही बनेगा (अर्थात्‌ मुझे उसका वध करवाना ही पड़ेगा). सुग्रीव के वचन सुनते ही सब वानर तुरंत जहां-तहां चल दिए.

सुग्रीव ने अंगद, नल, हनुमान् आदि प्रधान-प्रधान योद्धाओं को बुलाया और कहा- हे धीरबुद्धि और चतुर नील, अंगद, जाम्बवान और हनुमान! तुम सब श्रेष्ठ योद्धा मिलकर दक्षिण दिशा को जाओ और सब किसी से सीताजी का पता पूछना. मन, वचन तथा कर्म से उसी का (सीताजी का पता लगाने का) उपाय सोचना. श्री रामचंद्रजी का कार्य संपन्न (सफल) करना. सूर्य को पीठ से और अग्नि को हृदय से (सामने से) सेवन करना चाहिए, परंतु स्वामी की सेवा तो छल छोड़कर सर्वभाव से (मन, वचन, कर्म से) करनी चाहिए. माया (विषयों की ममता-आसक्ति) को छोड़कर परलोक का सेवन (भगवान के दिव्य धाम की प्राप्ति के लिए भगवत्सेवा रूप साधन) करना चाहिए, जिससे भव (जन्म-मरण) से उत्पन्न सारे शोक मिट जाएं. हे भाई! देह धारण करने का यही फल है कि सब कामों (कामनाओं) को छोड़कर श्री रामजी का भजन ही किया जाए. सद्गुणों को पहचानने वाला (गुणवान) तथा बड़भागी वही है जो श्री रघुनाथजी के चरणों का प्रेमी है. आज्ञा मांगकर और चरणों में फिर सिर नवाकर श्री रघुनाथजी का स्मरण करते हुए सब हर्षित होकर चले. (जारी है…)

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