वो चुनाव जब नीतीश के पिता ने कांग्रेस से खफा होकर जॉइन कर ली थी जनता पार्टी!

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…बात नीतीश कुमार के जन्म से भी 9 साल पहले की है. कहानी कांग्रेस पार्टी के अंदर की है. इस कहानी के एक सिरे पर कांग्रेस पार्टी है तो दूसरे सिरे पर जनता दल यूनाइटेड के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पिता हैं, जो एक जमाने में कांग्रेसी थे. अपने इलाके में जमीनी पकड़ के साथ चुनावी टिकट के दावेदार थे. लेकिन वादे पर भरोसा करके धोखा खा गए…फिर सियासी चैप्टर आगे बढ़ता है, कई दशक बीत जाते हैं और नीतीश कुमार उसी इलाके से रिकॉर्ड जीत हासिल करते हैं जहां से उनके पिता कांग्रेस के अपने वादे से मुकरने के कारण निराश होकर, बगावत करके और फिर हार का सामना कर चुके थे.

पत्रकार और लेखक अरुण सिन्हा अपनी किताब ‘नीतीश कुमार और उभरता बिहार’ में लिखते हैं- नीतीश के पिता रामलखन सिंह ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था, नजरबंद हुए और जेल भी गए. आजादी के पहले ही छात्र जीवन में वे कांग्रेस के काम और आंदोलन से जुड़ गए थे. वे साइमन कमीशन के खिलाफ आंदोलन करते हुए जेल गए. बख्यितारपुर में एक आयुर्वेदिक चिकित्सक बनकर भी वे कांग्रेस के काम से जुड़े रहे. 1942 में गांधीजी के भारत छोड़ो के आह्वान पर वे आंदोलन में शामिल हो गए. रामलखन सिंह ने चिकित्सा करना छोड़ दिया. औपनिवेशिक सरकार के काम में बाधा डालने की गतिविधियों के कारण वे गिरफ्तार हुए. जेल गए. आजादी के बाद भी वे कांग्रेस से जुड़े रहे. 1950 का दशक आते-आते एक चिकित्सक के अलावा वे बख्तियारपुर में एक बहुत ही लोकप्रिय कांग्रेसी नेता बन चुके थे.

अरुण सिन्हा लिखते हैं- 1952 में बिहार विधानसभा के लिए पहले आम चुनावों में बख्तियारपुर सीट के लिए स्वतंत्र मताधिकार पर आधारित कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ने का वास्तव में कोई हकदार था तो वह रामलखन सिंह थे, लेकिन कांग्रेस ने वह टिकट किसी और को दे दिया एवं अगले चुनाव में उनको नामित करने का वचन दिया. जब 1957 में भी उन्हें टिकट नहीं दिया गया तो उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी, दूसरी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और बुरी तरह हार गए. ‘


1951-52 के चुनाव में क्या हुआ था?

अरुण सिन्हा अपनी किताब में लिखते हैं- ”1951-52 के लिए चुनाव सूची से रामलखन का नाम निकाल दिया गया, क्योंकि पटना में कांग्रेस के दोनों परस्पर गुटों में किसी को भी राज्यभर में अपने गुटों के अंदर, सभी जातियों, विशेषकर उच्च जातियों को यथोचित प्रतिनिधित्व देने की अपनी समग्र रणनीति में रामलखन कहीं से फिट होते नजर नहीं आए. रामलखन को बहुत दुख पहुंचा फिर भी गुट के नेताओं ने जब उन्हें भरोसा दिलाकर बहुत मनाया कि अगले चुनाव में एक सीट अवश्य दी जाएगी तो वे मान गए और बख्तियारपुर से कांग्रेसी उम्मीदवार सुंदरी देवी के पक्ष में पूरे मन से चुनाव प्रचार किया और वह चुनाव जीत गईं.”


1957 के चुनाव की वो बगावत…

इस सियासी कहानी में अगला सोपान काफी रोचक होने वाला था. अरुण सिन्हा लिखते हैं- ”अगले पांच साल तक रामलखन सिंह समर्पित कार्यकर्ता बने रहे. श्रीकृष्ण सिन्हा और अनुग्रह गुट ने जैसे ही 1957 के चुनावों के लिए अपने-अपने प्रत्याशियों की सूची बनानी शुरू की, रामलखन ने उन्हें अपना वचन याद दिलाया. किसी ने उनकी बात नहीं सुनी. तारकेश्वरी सिन्हा और सुंदरी देवी को फिर पूर्वी पटना और बख्तियार सीट से मौका किया गया. इस बार धैर्य का बांध टूट गया और रामलखन ने दोनों धड़ों को सबक सिखाने की ठान ली. उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी और रामगढ़ के राजा के नेतृत्व वाली जनता पार्टी में शामिल हो गए लेकिन उन्हें अपने इलाके की जगह बाढ़ क्षेत्र से चुनाव में उतरने का मौका मिला. बाढ़ की जगह वे बख्यितारपुर में जनता पार्टी उम्मीदवार के पक्ष में चुनाव प्रचार में जोर लगाए हुए थे.

अरुण सिन्हा नीतीश कुमार के इंजीनियरिंग काल के सहपाठी से बातचीत का हवाला देते हुए आगे लिखते हैं-”कॉलेज में, शुरू-शुरू के दिनों में, नीतीश ने अपने पिता के कांग्रेस छोड़ देने और उनकी असफल चुनावी सैर के बारे में हमें बताया था, लेकिन इस बारे में कभी भी हमने विस्तार से कोई चर्चा नहीं की. शायद दोस्त अपने दोस्तों के परिवारों के बारे में शुरू-शुरू में थोड़ा बहुत ही जानते हैं. हो सकता है, नीतीश को स्वयं अपने पिता की 1952 की वेदना और 1957 के विद्रोह के बारे में कुछ खास जानकारी न हो, क्योंकि उनका जन्म 1951 में (1 मार्च को) हुआ था और इस बारे में उन्होंने जो कुछ भी टुकड़ों में सुना था, अपने पिता से, अपनी मां से, संबंधियों से और दूसरे लोगों से सुना था.”


बाढ़ सीट से रामलखन सिंह चुनाव हार गए. उन्हें कांग्रेस उम्मीदवार तारकेश्वरी सिन्हा के 79,000 वोटों की तुलना में सिर्फ 9500 वोट हासिल हो पाए. लेकिन अपने इलाके में दम लगाकर उन्होंने बख्यितारपुर सीट से कांग्रेस उम्मीदवार सुंदरी देवी को अपनी पार्टी के उम्मीदवार के सामने हारने पर मजबूर कर दिया.”

कांग्रेस से दूरी और फिर चुनावी हार रामलखन सिंह के सियासी करियर का अंतिम सच बनकर रह गया लेकिन उनका सियासी सपना वर्षों बाद पूरा हुआ जब उसी बाढ़ सीट से बेटे नीतीश कुमार ने पांच बार चुनाव जीता और हर बार वोटों का रिकॉर्ड तोड़ते रहे. सिर्फ बाढ़ और नालंदा के इलाके का ही नहीं बल्कि देखते ही देखते नीतीश कुमार समूचे बिहार की सियासत का वो चेहरा बन गए जिनका कोई विकल्प फिलहाल तो नहीं दिखता. आज के वक्त में नीतीश जिस पाले में खड़े हो जाते हैं सत्ता का पलड़ा उधर ही झुक जाता है.

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